
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य यह स्वयं अवलोकन करे कि एक तरफ शरीर है और दूसरी तरफ आत्मा है। जीवन में किसको अधिक महत्व देते हैं। यदि अपने शरीर को महत्त्व देते हैं तो शरीर के साथ मेरे माता-पिता, भाई बहन, परिवार सब जुड़ जाते हैं। मैं देह हूं ऐसा मानकर जो देह को महत्त्व देता है तो वह चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण कराता है। जो केवल अपनी आत्मा को महत्व देते हैं मैं आत्मा, तुम आत्मा सबमें समान आत्मा ऐसा आत्मार्थी साधक इस भव सागर से पार हो जाता है।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि एकांत में बैठकर चिंतन करें जीव को जाने समझेे आत्मसात करंे और उसमें गहरे चले जाएं तो आत्मा के अनंत सुख की प्राप्ति होगी। सभी तीर्थंकरों की साधना आत्मा की थी। भगवान महावीर को अनेक उपसर्ग आये, अर्जुन माली ने उपसर्ग आए उसे सहन किया वे सभी हमारे जैसे ही संसारी जीव थे। जिसने जीवन को साधा वे सिद्धशिला चले गये। शरीर के साथ आत्म तत्व को जाना समझा नहीं तो कोई महत्व नहीं है। आत्मा कभी वाणी के विकल्प में बंध नहीं सकता है आत्मा स्वतंत्र अस्तित्व है।
जब तक मन बुद्धि इन्द्रियों में सक्रिय रहेंगे तो आत्मा की अनुभूति नहीं हो सकती। मन व्यक्ति को भूत-भविष्य में ले जाता है। आत्मानुभूति के लिए मन का मौन, बुद्धि को गौण, काया को स्थिर करना होगा। फिर धीरे-धीरे आत्मा का अनुभव होने लगता है। जब जीव अपने में स्थित होता है तो अनंत शांति मिलती है, शून्य की स्थिति आती है तो जीव को सुख आत्म शक्ति मिलती है। जो कर्म बांधे है जीव अपने में स्थित रहता है तो धीरे-धीरे कर्म कटते चले जाते हैं।
महावीर जैसे महापुरुष शरीर की उपेक्षा करते है, जीव के साथ जीव में ठहरने का पुरुषार्थ करते हैं, वे जीव में अनंत शक्ति है उसका अनुभव करते हैं। आत्मा अनुभवगम्य है अपने भीतर जाओ अनुभव करो, मौन, शांत होकर ध्यान के द्वारा ही आत्मा को जान सकते हैं। ध्यान से ही आत्मा को जान सकते है। जो कुछ भी प्राप्त किया जाता है वह ध्यान से ही प्राप्त होता हैै। सभी तीर्थंकरों ने ध्यान के द्वारा ही प्राप्त किया।
आचार्य भगवन ने महाराष्ट्र प्रवर्तिनी महासाध्वी प्रभाकंवर जी म.सा. के जन्म शताब्दी के बारे में फरमाया कि का आज महासाध्वी प्रभाकवंर जी म.सा. का जन्म शताब्दी वर्ष प्रारंभ हो रहा है उन्होंने 2006 से 2014 तक महाराष्ट्र प्रवर्तिनी पद पर अपनी सेवाएं दी। 15 वर्ष की आयु में दीक्षा लेकर 72 वर्ष तक वे सेवा करते रहे। उन्होंने अपना जीवन स्व-पर कल्याण के लिए जिया।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि जब कर्म विपाक के अनुभव में आता है और उसका अनुभव करते हैं। वेदन तीव्र या मंद फल देने के उपरांत वह कर्म आत्म प्रदेशों से अलग हो जाते हैं। जब कर्म निकलकर अलग होने का समय आता है। वेदन के समय जब आर्त्त-रौद्र ध्यान कर लेते हैं, यदि क्रिया प्रतिक्रिया करते हैं तो वहां आर्त्त-रौद्र ध्यान का कर्म बांध लेते हैं। यदि उस समय कर्म निकल कर आए तो यह सोचें कि यह औदारिक पराया है, यह शरीर पर है पराया है। वेदन कर्म निकलकर आया और जीव स्वभाव में रहता है तो कर्म निकल जाता है।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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