
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य मोह की नींद में सोया हुआ है। जिस तरह से एक गहरी नींद में सोये हुए व्यक्ति का धन-माल चोर चुरा ले जाता है। जब वह जागता तो देखता है सब कुछ चला गया, इसी तरह व्यक्ति मोह की नींद में सोया हुआ है। जो सोता है वह खोता है। जब तक शरीर की स्वस्थता है, बुढ़ापा नहीं आ जाता है तब तक आत्म ध्यान, धर्म आराधना कर लेनी चाहिए।
आचार्य भगवन् ने आगे फरमाया कि आत्मा अपने आपमें शुद्ध, सम्पन्न, परिपूर्ण है। मनुष्य देह निर्माण से पहले आत्मा आती है। आत्मा के आने के बाद ही मनुष्य शरीर की इन्द्रियां, मन, बुद्धि का निर्माण होता है। इसलिए आत्मा की शक्ति को समझना चाहिए। जैन दर्शन का अटल सिद्धांत है कि जीव अजर-अमर-अविनाशी है। प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन् ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में द्रव्य संवर में फरमाया कि मन, वचन, काया की अनावश्यक प्रवृति को जब रोक देते हैं तो कर्मों का बंध नहीं होता। आत्मा का पोषण करते हैं तो कर्मों का बंधन नहीं होता है। जैसे सम्यक्त्व भरी वाणी का चिंतन करना, वाणी से मौन रहना और यदि बोलना है तो विवेकपूर्वक बोलना कि कर्म आश्रव न हो। काय गुप्ति में कोई काया की ऐसी कोई प्रवृति न हो जिससे कर्मों के आश्रव हो।
इस प्रकार इन तीनों के गोपन से कर्मों के आने रास्ते बंद हो जाते हैं। आत्मा अपने स्वभाव में रहती है स्वभाव में रहने से क्रिया नहीं लगती है, कर्म नहीं लगते हैं। जब व्यक्ति अक्रिय रहता है तो वह कर्मों की निर्जरा होती है।
युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘आओ भगवन आओ, इस अंतर मन में आओ’ भजन की प्रस्तुति दी।
ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
