
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आज श्रमण संघ के द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री आनन्द ऋषि जी म.सा. की जन्म जयन्ती का आयोजन हुआ। जन्म जयन्ती के अवसर पर आचार्य श्री जी अपने उद्बोधन में फरमाया कि आज हम सभी युगपुरुष का जन्मोत्सव मना रहे हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन देश और संघ-समाज के लिए समर्पित कर दिया। जिस तरह से मिश्री और नमक दोनों का रंग एक समान है किंतु उनका स्वभाव अलग है जैसे मिश्री कभी नमक नहीं हो सकती और नमक कभी मिश्री नहीं हो सकता इसी तरह आचार्य आनन्द ऋषि जी महाराज जिनके नाम में ही नहीं स्वभाव में भी आनन्द था।
आचार्य आनन्द ऋषि जी की आंखों में तेज, उनकी वाणी में ओज था और ओज में विनय का भाव था। ऋषि वह है जो प्रकृति के नियम के अनुसार चलता हैं। वे सार गर्भित बात कहते ऐसे आचार्य आनन्द ऋषि थे।
उन्होंने महाराष्ट्र के अहमदनगर वर्तमान में अहिल्यानगर में प्राकृत, संस्कृत आदि भाषाओं के ज्ञान व विद्या अध्ययन के लिए श्री तिलोक रत्न आनन्द जैन धार्मिक परीक्षा बोर्ड का निर्माण करवाया जो उन्हीं की देन है। जिसमें कोई भी विद्या अध्ययन कर सकता है।
आचार्य भगवन ने उनके प्रसंगों का उल्लेख करते हुए फरमाया कि उन्हें आयंबिल सबसे अधिक प्रिय थे। वे एक समय भोजन करते थे। उनका जीवन सहज सरल था। वे बांसुरी की भांति निर्ग्रंथ थे। बांसुरी जो श्रीकृष्ण को प्रिय थी उसमें कोई गांठ नहीं होती। ऐसे ही निर्ग्रंथ में कोई गांठ नहीं होती और बांसूरी को जब मुंह पर लगाते हैं तो मीठी ध्वनि ही निकलती है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि भगवान की वाणी में कहा गया है कि जहां सरलता, ऋजुता है वहां धर्म रहता है। जिसके जीवन में सरलता, ऋजुता नहीं है वह आगे नहीं बढ सकता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आचार्य श्री आनन्दऋषि जी म.सा. ने अपने शरीर के माध्यम से श्रमण संघ को नई दिशा प्रदान की इसलिए उनके जन्म जयंती पर हम कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ‘‘वंदन तुमको वंदन, गुरु आनन्द ऋषि उपकारी’’ मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘बोलो-बोलो जयकार गुरुवर आनन्द की’’ श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘जाने जिनको सारा जहां महिमा जिनकी थी सबसे महान’’ श्री शाश्वत मुनि जी म.सा. ने ‘‘आओ भगवन आओ, इस अंतर मन में आओ’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।
शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से श्री अशोक मेहता ने अपनी भावनाएं व्यक्त की।
ऑनलाईन के माध्यम से उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने प्रत्याख्यान लिये।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ का कार्यक्रम गतिमान है। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन को कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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