
आचार्य भगवन् ने अपने दैनिक उद्बोधन में समाधि तंत्र के अंतर्गत संसार में दुःख के कारणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि संसार में जन्म-मरण दुःख का कारण है। दुःख के समय कैसे सुखी रह सकते हैं और सुख में कैसे समभाव के साथ रह सकते हैं, इसका बोध होना जरूरी है। जिसे इसका बोध हो जाए वह सदा सुखी रह सकता है। सुख और दुःख पक्षी के पंख के समान है जिससे वह आसमान में उड़ान भरता है और पुनः नीचे आता है। इसी प्रकार मनुष्य जीवन में सुख और दुःख दो पहलू हैं जो साथ चलते हैं।
आचार्य भगवन ने आगे यह भी फरमाया कि शरीर को आत्मा मानना और आत्मा को शरीर मानना भी दुःख का कारण है। शरीर की सारी प्रवृतियां बाहरी है। शरीर एक हड्डियों का ढांचा मात्र है जो रक्त, मांस से लिपटा हुआ एक पुतला है उसी में आत्म तत्व है जिससे वह शरीर गतिशील है। शरीर तो पुद्गल है, पुद्गल का स्वभाव परिवर्तनशील है, जो गलता, सड़ता है और मिट जाता है। आत्म तत्व कभी नहीं मिटता है, आत्मा शाश्वत सत्य है।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि व्यक्ति शरीर और आत्मा की भिन्नता को समझे और भिन्नता का प्रयोग करे। जब शरीर में कोई रोग आ जाए तो समझे कि रोग शरीर को आया है आत्मा को नहीं आया है। एक परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी है तो एक संयोग है अनित्य भावना रहे कि जब देह मेरी नहीं है तो यह परिवार के रिश्ते-नाते मेरे कैसे हो सकते हैं। जब आयुष्य पूर्ण होता है तो किसी न किसी को एक दिन जाना होता है, इसलिए मनुष्य इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करते हुए जीवन को समझने का प्रयास करे तो उसका जीवन आनन्द के साथ व्यतीत होता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में शरीर निर्माण नामकर्म का उल्लेख करते हुए फरमाया कि जब निर्माण नामकर्म उदय में आता है तो व्यक्ति के शरीर में भिन्नता देखने को मिलती है किसी का कान अपने आकार से बड़ा है या शरीर का कोई अंग सामान्य से विकृत आकृति में है तो वह नामकर्म उदय के कारण है।
कोई भी सिद्ध अपने कर्मों को क्षय किये बिना सिद्ध बुद्ध नहीं बन सकता। ध्यान में भी अनेक रूकावटें आती है, आत्मा तक पहुंचने के लिए मेरेपन के भाव को तोड़ना होगा। मानसिक रूप से मेरेपन के भाव को पकड़ रखा है। जीव अकेला है जब तक संयोग है तब तक साथ है और आकार मे साकार का दर्शन हो रहा है।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘अरे आत्मा रे तुझे किसका डर है’’ भजन की प्रस्तुति दी।
ऑनलाईन के माध्यम से अहिल्यानगर से सरला गांधी ने आज 7 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान लिया। इसके अलावा उपवास, एकासन, आयंबिल का तप करने वाले तपस्वियों ने भी ऑनलाईन के माध्यम से प्रत्याख्यान लिये।
इस अवसर पर आचार्य भगवन के दर्शनार्थ सुनाम से आये हुए श्रद्धालु भी उपस्थित थे।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ का कार्यक्रम गतिमान है। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन को कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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