
आचार्य भगवन् ने दैनिक उद्बोधन में समाधि तंत्र के अंतर्गत संसार में दुःख के कारणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि संसार में निर्धन, अमीर, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ सभी तरह के लोग रहते हैं, किंतु यह संसार दुःखमय है। भगवान महावीर की वाणी में भी जन्म-मरण, आधि-व्याधि को दुःख बताया गया है। शरीर में कोई व्याधि अर्थात रोग आ जाए तो भी शरीर को बहुत कष्ट होता है। दृष्टि के अभाव में और इन्द्रिय विषयों की आसक्ति दुःख का कारण है। महात्मा बुद्ध के अनुसार संसार में दुःख है, दुःख का कारण है, कारण का उपाय है और उपाय से मुक्ति भी है।
उन्होंने आगे फरमाया कि हम इस संसार में भटक रहे हैं, लेकिन अब भटकना नहीं है, क्योंकि हमें भगवान महावीर की साधना मिल गई, प्रभु का मार्ग मिल गया अब उस पर चलने के लिए पुरुषार्थ करना है जिससे जन्म-मरण से मुक्ति मिल सकती है।
आचार्य भगवन ने यह भी फरमाया कि जो शरीर को आत्मा मानते हैं वे मिथ्यात्वी है उनको मेरी सम्पति, मेरा परिवार ही अच्छा लगता है। परिवार में अपने बच्चों को सुखी करने के लिए माता-पिता अपना पूरा जीवन लगा देते हैं। यही बच्चे जब बड़े हो जाते हैं और माता-पिता वृद्ध हो जाते हैं तो उनकी सेवा नहीं करते। बच्चे अपने माता-पिता से मुंह मोड़ लेते हैं ऐसी अनेक घटनाएं देखने को मिलती है। पहले के समय में गुरुकुल में बच्चों को ब्रह्म ज्ञान, सत्य का बोध करवाते थे। अब सारी दृष्टि बदल गई, इसलिए बच्चों में बौद्धिक ज्ञान के साथ संस्कार जरूरी है। प्रवचन के पश्चात् आचार्य भगवन ने उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में आयुष्य कर्म के भेदों की चर्चा करते हुए फरमाया कि नरक आयु, तिर्यंच आयु, मनुष्य आयु और देव आयु। जिसके उदय से नरक में दीर्घकाल तक रहना पड़े वह नरक आयु कर्म है। जिसके उदय से तिर्यंच योनि में रहना पड़े तिर्यंच आयु कर्म, मनुष्य पर्याय के कर्म उदय से मनुष्य पर्याय में जन्म लेना पड़े। देव आयु कर्म के कारण देव योनि में जन्म लेना पड़े वह देवयोनि कर्म हैं। आयुष्य कर्म के आधार पर उसे उस भव में रहना पड़ता है। आयुष्य कर्म को बंदीगृह की उपमा दी गई है।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘चेतन निज में अब रमण करो’’ भजन की प्रस्तुति दी।
ऑनलाईन के माध्यम से तपस्या करने वाले तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल का प्रत्याख्यान लिया।
आचार्य भगवन के दर्शन हेतु आज भीलवाड़ा एवं सुनाम से दर्शनार्थी उपस्थित थे।
आत्म भवन में प्रतिदिन प्रातः 6.15 से 7.15 आत्म ध्यान, प्रातः 9.30 से 10.30 स्वाध्याय, ध्यान एवं मंगल पाठ का कार्यक्रम गतिमान है। आप सभी लाभ लेकर अपन जीवन को कृतार्थ करें।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
