





आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव ध्यान गुरु श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. की दिनांक 24 दिसम्बर 2025 से 17 अप्रैल 2026 तक चार माह की मौन ध्यान साधना आज शुक्रवार को सम्पन्न हुई। मौन साधना का अपने आपमें विशेष महत्त्व है। मौन आत्मा और परमात्मा के बीच संवाद का माध्यम है जो अंतःकरण को शुद्ध करता है। आत्मा की शुद्धि के लिए मौन आवश्यक है। मौन साधना वाणी और मन का संयम है, जो आंतरिक शांति, मानसिक एकाग्रता और आध्यात्मिक शक्ति को बढ़ाता है और कर्म बंधन को रोकता है।
मौन साधना की सम्पन्नता के अवसर पर पर आचार्य भगवन ने मंगल पाठ श्रवण करवाते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि हम अरिहंत परमात्मा की कृपा से शीतकालीन 4 माह की मौन आत्म ध्यान साधना में रहे। बोलना चांदी है तो मौन स्वर्ण के समान है। मौन का पालन सभी तीर्थंकरों ने किया है। भगवान महावीर साढ़े बारह वर्ष तक मौन साधना में रहे। मौन में कर्मों का बंधन कम होता है। मनुष्य व्यक्तित्व निर्माण में न जाने कितने कर्मों का बंधन कर लेता है। मौन से व्यर्थ की चर्चा से वंचित रह जाते हैं। यथा संभव व्यर्थ की चर्चा से बचना चाहिए।
आचार्य भगवन ने यह भी फरमाया कि साधक के जीवन में एक निश्चित समय सारणी हो कि जिसमें 4 से 6 घंटे वह मौन एवं आत्म ध्यान साधना में रहे। साधक जितना मौन में रहता हैं वह उतना ही अधिक भीतर सुख का अनुभव कर सकता है। आज के दिन एक संकल्प हो कि हमें व्यर्थ की, संसार की कोई चर्चा ही नहीं करनी है, चर्चा होगी तो अध्यात्म की चर्चा होगी।
उन्होंने आगे फरमाया कि किसी देहधारी की देह को नहीं उसकी आत्मा को देखो, आत्मा को महत्त्व दो। जैन दर्शन का मूल भेद विज्ञान है।
शिवाचार्य श्री जी के मंगल आशीर्वाद हेतु दिल्ली, मुंबई, नाशिक, लुधियाना, राहता, सवाई माधोपुर, उदयपुर, केलवा रोड, बारडोली एवं सूरत के अनेक उपनगरों से श्रद्धालू विशेष रूप से उपस्थित हुए।
विशेष – अक्षय तृतीया महोत्सव हेतु दिनांक 19 अप्रैल 2026 को शिवाचार्य श्री जी अवध संगरीला से विहार कर लब्धि पार्श्वनाथ तीर्थ धाम पधारेंगे, जहां शिवाचार्य श्री जी का 19 से 20 अप्रैल 2026 तक दो दिवसीय प्रवास होगा। 20 अप्रैल 2026 को अक्षय तृतीया पारणा महोत्सव का विशेष आयोजन होगा, जिसमें देशभर से सैकड़ों तपस्वी आचार्य श्री जी के दर्शनार्थ एवं पारणा हेतु उपस्थित होंगे। 19 अप्रैल 2026 को श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा के विजय वल्लभ समुदाय के गच्छाधिपति पदमश्री आचार्य श्री नित्यानन्द सूरीश्वर जी आदि ठाणा भी इस अवसर पर अपने मंगल दर्शन प्रदान करेंगे। 22 माह बाद आचार्य द्वय का मंगल मिलन होने जा रहा है।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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