






















आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव ध्यान योगी युग प्रधान आचार्य सम्राट पूज्य डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित विश्व ध्यान दिवस पर श्री ऑल इण्डिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेन्स की आत्म ध्यान प्रचार प्रसार योजना एवं शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के तत्वावधान में देशभर के लगभग 50 ध्यान केन्द्रों पर जूम के माध्यम से प्रातः 8.40 से 12 बजे तक आत्म ध्यान साधना शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें देशभर के लगभग चार हजार साधक-साधिकाओं ने अपने-अपने स्थानीय केन्द्रों पर जाकर सहभागिता दर्ज की। शिविर का लाईव प्रसारण जूम एप के माध्यम से अवध संगरीला, बलेश्वर, सूरत से किया गया। अवध संगरीला बलेश्वर में आचार्य श्री जी के सान्निध्य में प्रवर्तक डॉ. श्री राजेन्द्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा एवं साध्वीवृंद आदि विशेष रूप से सहभागी बने।
ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि भगवान महावीर ने साढ़े बारह वर्ष तक जो तप किया, साधना की, वही साधना इस पंचम काल में अरिहंत परमात्मा की कृपा से प्राप्त हो रही है। जब पुण्य की कई कतारें लगती है तब प्रभु की वाणी प्राप्त होती है। जैन दर्शन में भेद विज्ञान प्रमुख है। ये साधना भेद से अभेद, अभेद से भेद की साधना है। मनुष्य का शरीर आकार है और इसमें मन, बुद्धि, इन्द्रियां है।
मनुष्य के आकार से जीव का कोई संबंध नहीं है। आकार मिला वह रहने का स्थान है। जीव की कोई परम्परा, संघ नहीं। जीव अकेला है, अकेले आए, अकेले जाओगे, अकेले सिद्ध गति को प्राप्त करोगे। एकत्व भावना का पोषण करो। जिस प्रकार दूध में मक्खन है पर दिखाई नहीं देता उसी प्रकार आकार में आत्मा है। भगवान महावीर की साधना जीव की साधना थी। यदि एक आत्मा को जान लिया तो सब जान लोगे, एक आत्मा को नहीं जाना तो कुछ नहीं जाना। यदि मुक्ति को प्राप्त करना है तो अस्तित्व का ध्यान करो। जीव के प्रति श्रद्धा, रूचि करो, जीव में ठहर जाओ। जीव अमूर्त है, जिसे कोई देख नहीं सकता। आत्म साधना मात्र जीव की है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आत्म ध्यान के परिचय में फरमाया कि साधक का जीवन कितनी भी आधि-व्याधि, अशांति, दुःख, परेशानी से भरा हुआ हो, यदि व्यक्ति की दृष्टि बदल गई तो वह शरीर से आत्मा की ओर अभिमुख हो सकता हैं। अस्तित्व के बिना कोई जीवन नहीं है किंतु व्यक्ति अपना सारा जीवन व्यक्तित्व को बनाने के लिए लगा हुआ है। बोध के अभाव में व्यक्ति जहां सुख नहीं वहां सुख खोज रहा है। पढ़े-लिखे डिग्री प्राप्त युवा तनाव के कारण आत्म हत्या कर रहे हैं। एक व्यक्ति संसार को देखता है, व्यक्तित्व देखता है, अच्छा-बुरा, ऊंचा नीचा, अपना-पराया देखता है। दूसरा वह है जो सभी में अपने समान जीवात्मा को देखता है, वह जीव को मुख्यता देता है। अपने दृष्टिकोण को बदलकर मिथ्या दृष्टि से सम्यक् दृष्टि लानी है। इस अवसर पर उन्होंने स्वस्थ रहने के लिए शरीर की यौगिक क्रियाएं भी करवाई।
शिविर का शुभारम्भ युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. द्वारा प्रार्थना के साथ हुआ। वीतराग साधिका निशाजी ने ध्यान के प्रयोग करवाते हुए कहा कि चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में कोई छोटा या बड़ा नहीं है। सभी अष्ठ गुण सम्पदा लेकर कर्म के उदय से देह धारण किए हुए यात्रा कर रहे हैं। कोई निंदनीय नहीं। महाविदेह, भरत, ऐरावत में आप हम सब जीव एक समान हैं। सारे भेद मिटा दो कोई मित्र, शत्रु, कोई पराया नहीं, सारे भेद मिटा दो, अभेद दृष्टि से अपने निज स्वरूप में उतर जाओ। जो आप में हैं, वही आत्म तत्व सभी में विद्यमान है। जीव ही सत्य है जो तीन काल में नहीं बदल सकता। मूल है जीव तत्व। मुक्त होने के लिए स्वरूप को जानना अनिवार्य है जो स्वयं को नहीं जानता, आत्मा को नहीं जानता वह मुक्त नहीं हो सकता। मुक्त होने के लिए आत्मा का ध्यान ही सर्वश्रेष्ठ विधि है। इस अवसर वीतराग साधिका जी ने अरिहंत वाणी के माध्यम से साधकों को अनादिकाल का प्रतिक्रमण एवं आलोचना का प्रयोग करवाया।
राजस्थान के शाहपुरा केन्द्र में साध्वी श्री प्रतिभा श्री जी आदि ठाणा-3 के सान्निध्य में 90 साधक-साधिक सहभागी रहे। उदयपुर के हिरण मगरी केन्द्र पर साध्वी श्री मधुकुंवर जी म.सा. आदि ठाणा-6 सहित 225 साधक-साधिका सहभागी रहे। चित्तौड़गढ़ के सैंथी केन्द्र में श्री जिनेन्द्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा के सान्निध्य में 70 साधक-साधिका सहभागी रहे। चण्डीगढ़ में महासाध्वी श्री सुव्रता जी म.सा. आदि ठाणा-4 सहित कुल 101 साधक-साधिका सहभागी रहे। पंचकुला में उपप्रवर्तिनी महासाध्वी ओमप्रभा जी, महासाध्वी प्रतिकप्रभा जी आदि ठाणा 12 सहित कुल 95 साधक-साधिक सहभागी रहे। लुधियाना प्रवचन प्रभाविका महासाध्वी श्री किरण जी म.सा आदि ठाणा-8 सहित कुल 180 साधक-साधिका सहभागी बने। दिल्ली के अशोक विहार में उपप्रवर्तिनी महासाध्वी श्री रमेशकुमारी जी आदि ठाणा 9 के सान्निध्य में कुल 79 साधक-साधिका सहभागी रहे। आदीश्वर धाम कुप्पकलां में श्री आत्मदृष्टा जी म.सा. आदि ठाणा-3 एवं साध्वी श्री आत्मरमणीजी म.सा. आदि ठाणा -11 सहित कुल 14 साधु-साध्वीवृंद सहभागी रहे।
निम्न केन्द्रों पर अनेक साधक-साधिकाओं ने सीखा आत्म ध्यान – गुजरात से अवध संगरीला, बलेश्वर 100, पुष्कर भवन, वेसू, सूरत, गुजरात में 150, शांति भवन घोड़-दौड़ रोड, सूरत में 36, महावीर भवन, उधना, सूरत में 45 साधक-साधिकाएं।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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