जीव की सुरक्षा धर्म ही कर सकता है |

- आचार्य शिवमुनि

2 NOVEMBER 2025

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में चल रहे ऑनलाईन आत्म ध्यान धर्म यज्ञ के नौवें दिन नाशिक व कुप्पकलां केन्द्र में सहभागी साधकों व उपस्थित धर्म सभा को जड़ और जीव का भेद करवाते हुए आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।

इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने सम्बोधन में भोग में आसक्त जीवों की दुर्दशा का वर्णन करते हुए फरमाया कि मनुष्य के शरीर में रोगों का कारण है पांच इन्द्रियों के तेईस विषय। जिसे काम भोग कहा गया है। भोगों की आशा, तृष्णा, आकांक्षा, अभिलाषा की चुभन निरंतर व्यक्ति को पीड़ित करती रहती है। आसक्ति पूर्वक काम-भोग के आसेवन से अथवा असातावेदनीय कर्म के उदय से अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैैंं। ऐसा रोगी जिनके साथ रहता है उसके साथ वाले उसकी निंदा करते हैं। कोई भी उसकी रक्षा करने में, उसको शरण देने में समर्थ नहीं होता।

उन्होंने अशरण भावना का उल्लेख करते हुए आगे फरमाया कि सामान्य व्यक्ति यह चिंतन करता है कि उसे धन सुख देगा। जब दुकान नहीं होती है तो दुकान की चिंता करता है और जब दुकान हो गई तो घर, गाड़ी हो जाए। किसी भी तरह सुख बना रहे और मेरी सुरक्षा हो जाए ऐसे उपायों को करता है। पहले अपनी ही सुरक्षा का ध्यान था लेकिन अब धन कमाया धन की सुरक्षा, परिवार की रक्षा की चिंता हो गई। इस प्रकार सबकी चिंता, अपनी चिंता बन जाती है। मनुष्य जितना सुख और सुरक्षा के उपाय कर रहा है उसमें उतनी ही अधिक कार्मण शरीर की वृद्धि हो रही है। जब जीव को आत्मबोध हो जाए कि जीव की सुरक्षा कोई नहीं केवल धर्म ही कर सकता है। व्यक्ति जितना सुरक्षित होना चाहता है उतना ही असुरक्षा का भाव उत्पन्न होता है।

उन्होंने फरमाया कि सबसे ज्यादा मन के रोग है जिसे आधि कहा गया है, इसका परिणाम है ब्लड प्रेशर, तनाव आदि रोग। मन में भूत भविष्य की चिंताएं चल रही है। मन के विचारों का प्रभाव शरीर पर आता है जो स्वभाव में नहीं रहते देते, जैसे ही मन शांत होता है पुनः वैसे ही मन भूत भविष्य में चला जाता है। इसलिए मन की शांति के लिए अपने भीतर अवलोकन करें कि मैं कहां हूं? किसी स्थिति में हूं और कहां जाना है? आत्म कल्याण आत्म ध्यान द्वारा ही संभव है।

मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘जीया कब तक उलझेगा, संसार विकल्पों में’’ भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया कि कायोत्सवर्ग तपों का 12वां तप है। कायोत्सर्ग का अर्थ है काया का उत्सर्ग करना, काया के ममत्व को छोड़ना। भगवान महावीर ने खड़े रहकर कायोत्सर्ग किया और सर्दी-गर्मी को सम भाव से सहन करते हुए कर्म मुक्त हो गए।

इस अवसर पर सिकन्दराबाद से नमो विहार सेवा गु्रप के श्रावक आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित हुए। उन्होंने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि नमो विहार गु्रप द्वारा जैन धर्म के सभी सन्तों की विहार सेवा आठ माह निरंतर की जाती है।

आज नवदीक्षित श्री शमेश मुनि जी, श्री शूचित मुनि जी एवं श्री शशान्त मुनि जी की दीक्षा के 6 माह पूर्ण होने पर श्रीमती मनिषा संचेती ने ‘‘छोटे-छोटे मुनियों की थी दीक्षा छह महीने की थी परीक्षा’’ अनुमोदना भजन के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त की।

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