



आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने चार दिवसीय ध्यान साधना सम्पन्न कर आज बुधवार को नव वीर निवार्ण संवत का मंगल पाठ प्रदान किया।
आचार्य भगवन ने मंगल पाठ प्रदान करते हुए फरमाया कि आप सभी ने दीपावली की आराधना के तहत श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचना को सुनकर अपने जीवन को धन्य किया। प्रभु महावीर की वाणी 16 प्रहर तक निंरतर चलती रही और भगवान निर्वाण को प्राप्त कर अपना कार्य सिद्ध कर गए। गौतम स्वामी को केवलज्ञान हो गया वे भी कर्मों का क्षय कर मोक्ष को प्राप्त हो गए।
आचार्य श्री जी आगे फरमाया कि अपने जीव के कल्याण के लिए आज के दिन एक लक्ष्य बनाएं कि मैं जीवात्मा हूं मेरा घर सिद्धालय है, मुझे निश्चित सिद्धालय जाना है। सिद्धालय जाने के लिए मिथ्यात्व और मोह को दूर करना होगा। मनुष्य का यह मिथ्यात्व है कि उसने इस देह को अपना मान लिया जिस कारण से चार गति चौरासी लाख जीवायोनियों में भटक रहा है। जो साधक कोई भी कार्य करते हुए अपने जीव को केन्द्र बिन्दू बनाता है तो उसका कार्य सिद्ध हो जाता है। इस संसार में व्यक्ति का कोेई मित्र, संबंधी नहीं है। यदि जीव को केन्द्र बिन्दू बनाएंगे तो मंगल और कल्याण होगा।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि श्री उत्तराध्ययन को सार रूप में देखा जाए तो पहला लक्षण विनय भाव है। व्यक्ति चाहे कितने ही ऊंचे पद पर हो वह विनय को नहीं भूले। विनय ही धर्म का मूल शास्त्रों में बताया गया है। यदि किसी का उपकार भी करते हैं तो उसका प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी के द्वारा श्री उत्तराध्ययन सूत्र के छत्तीसवें अध्ययन ‘जीवाजीव विभक्ति’ की शेष 95 गाथाओं के मूल वांचन के साथ ही 21 दिवसीय अनुष्ठान का समापन हुआ।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 35वें अध्ययन ‘अनगार’ के विश्लेषण में फरमाया कि गृहस्थ का जीवन आगार का होता है और साधु का जीवन अनगार का होता है। जिन्होंने घर को त्याग दिया वह अनगार है। संयम धारण कर साधु बनने के बाद अपने जीवन को तप और स्वाध्याय में लगाना ही साधु का लक्ष्य होता है।
36वें अध्ययन ‘जीवाजीव विभक्ति’ का विश्लेषण में आगे फरमाया कि जीव और अजीव दोनों इस लोक के आधार हैं। ज्ञान, दर्शन और चारित्र की उत्कृष्ट साधना द्वारा अजीव द्रव्यों से आत्मा को पृथक करना ही जीवाजीव विभक्ति अध्ययन का सार है।
आज सूरत सिटी के अलावा चैन्नई, दिल्ली, मुंबई, शिरड़ी, नाशिक से श्रावक-श्राविकाएं आचार्य श्री जी के दर्शन एवं मंगल पाठ श्रवण करने के लिए उपस्थित हुए। सभी श्रद्धालुओं ने आचार्य भगवन के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए विवेक पूर्वक दूर से ही दर्शन लाभ प्राप्त किये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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