


युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी ने आज प्रभु महावीर के निर्वाण कल्याणक दिवस पर चार प्रहर के जाप, लोगस्स पाठ का जाप, आत्म ध्यान साधना करने की प्रेरणा दी एवं श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व समवसरण ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 29वें अध्ययन ‘सम्यक्त्व पराक्रम’ के विश्लेषण में फरमाया कि सम्यक्त्व सत्य को कहा जाता है। जिस साधक को सत्य की प्राप्ति हो जाती है उसे सांसारिक कार्य अच्छे नहीं लगते हैं और वह मुक्ति की ओर जाने का प्रयास करता है। गृहस्थ अपना चेहरा दर्पण में इसलिए देखता है कि कहीं चेहरे पर कुछ लगा हुआ तो नहीं है चेहरा अच्छा दिखे उसी तरह एक आत्मार्थी साधक का चिंतन रहता है कि कहीं भीतर में राग-द्वेष तो नहीं है। आत्मार्थी साधक का सभी जीवों के प्रति दया, मैत्री, करुणा का भाव रहता है।
30वें अध्ययन ‘तपोमार्ग गति’ का विश्लेषण करते हुए प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने आगे फरमाया कि साधक आश्रवों को रोकता है जिससे कोई कर्म नहीं आए और तप के द्वारा पूर्व कर्मों का क्षय करता है। वह परलौकिक सुखों की इच्छा नहीं करता है। साधु रस का परित्याग करते हुए गर्मी में गर्मी की आतापना व सर्दी में शीत की आतापना लेकर काय क्लेश तप करते हैं। जो शिष्य वृद्ध, अस्वस्थ, तपस्वी संत की सेवा करता है, शास्त्रों का स्वाध्याय करता है, मन की एकाग्रता के लिए ध्यान करता है वह वह कर्मों को निर्जरित करता हुआ मोक्ष प्राप्ति की ओर बढ़ सकता है।
उन्होंने 31 वें अध्ययन ‘चरण विधि के विवेचन में फरमाया कि संयम धर्म की पालना चारित्र का आधार है। कोई भी व्यक्ति मकान पर चढ़ता है तो वह सीढ़ी दर सीढ़ी चढ़ता है यदि वह सीधा भागता हुआ चढ़ता है तो उसे गिरने का खतरा रहता है। जो साधक चरणबद्ध तरीके से तपस्या के क्षेत्र में आगे बढ़ता है वह मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। साथ ही उन्होंने विभिन्न प्रकार की तपस्याओं के बारे में वर्णन किया।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के तैतीसवें अध्ययन ‘प्रमाद स्थान’ की 25, चौतीसवें अध्ययन ‘लेश्या’ की 61 एवं पैंतीसवें अध्ययन ‘अनगार’ की 21 गाथाओं का मूल वांचन किया।
श्री शुभम मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व एवं सम्पन्नता के पश्चात् आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
नोट – आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. 21 अक्टूबर 2025 तक आत्म ध्यान मौन साधना में रहेंगे। आचार्य श्री जी 22 अक्टूबर 2025 को नव वीर निवार्ण संवत का मंगल पाठ आत्म भवन अवध संगरीला में प्रदान करेंगे, जिसका जैनाचार्यजी यू-टयूब चैनल पर सीधा प्रसारण प्रातः 7.30 से किया जा सकेगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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