


युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी ने दीपावली पर्व के दिनों में अपने कर्मों की निर्जरा के लिए लोगग्स पाठ का जाप, आत्म ध्यान साधना करने की प्रेरणा दी एवं श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व समवसरण ध्यान का प्रयोग करवाया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के ‘खलुंकीय’ अध्ययन का विवेचन करते हुए फरमाया कि खलुंक यानि दुष्ट बैल। एक किसान बैल गाड़ी लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाता है। बैल गाड़ी में खलुंकीय बैल जोता हुआ है। खलुंकीय बैल बीच रास्ते में खड़ा हो जाता है, जिस ओर खड्ढे होते हैं उस ओर चलता है, बैलगाड़ी का चक्का भी टूट जाता है, जिससे वह किसान उस खलुंकीय बैल से दुःखी हो जाता है। जिस गुरु को खलुंकीय बैल की तरह शिष्य मिल जाता है, जो उदण्ड होता है, गुरु आज्ञा का पालन नहीं करता है, गुरु आज्ञा के विपरीत कार्य करता है जिससे गुरु उस शिष्य से दुःखी हो जाते हैैं।
उन्होंने गर्गाचार्य के दृष्टांत में फरमाया कि गर्गाचार्य के पांच सौ शिष्य थे और सभी उदण्ड थे, दुष्ट प्रवृति के, खलुंकीय बैल की तरह थे, सभी गुरु आज्ञा के विपरीत काम करते थे, सभी शिष्य गर्गाचार्य की ध्यान साधना में बाधक बन रहे थे। जिस तरह से जौ गाय-भैंस का खून चुसते रहते हैं उसी तरह उदण्ड शिष्य गुरु की चित्त समाधि में बाधक बन रहे थे। गुरु को अपने आत्म समाधि के लिए ऐसे शिष्यों को त्यागना पड़ा। जीवन में कभी किसी से अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए। अपेक्षा दुःख का कारण बनती है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि एक शिष्य या पुत्र ऐसा होता है जो अपने माता-पिता या गुरु की आज्ञा का पालन करता है, विनीत होता है, चाहे कितना ही महत्त्वपूर्ण कार्य हो उसे छोड़कर गुरु इंगित की आराधना करता है वह शिष्य गुरु की ध्यान साधना में सहयोगी बनता है और शिष्य भी धर्माराधना में आगे बढ़ता है।
उन्होंने 28वें अध्ययन ‘मोक्षमार्ग-गति’ का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए सबसे पहले सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, सम्यक् चारित्र और सम्यक तप आवश्यक है। सम्यक् यानि सत्य को जानना ग्रहण करना, श्रद्धा करना और पुरुषार्थ करना है।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के बत्तीसवें अध्ययन ‘प्रमाद स्थान’ की 111 गाथाओं का मूल वांचन किया।
श्री शुभम मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र वांचन से पूर्व एवं सम्पन्नता के पश्चात् आत्म ध्यान का प्रयोग करवाया।
नोट – आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. 18 अक्टूबर से 21 अक्टूबर 2025 तक आत्म ध्यान मौन साधना में रहेंगे। आचार्य श्री जी 22 अक्टूबर 2025 को नव वीर निवार्ण संवत का मंगल पाठ आत्म भवन अवध संगरीला में प्रदान करेंगे, जिसका जैनाचार्यजी यू-टयूब चैनल पर सीधा प्रसारण प्रातः 7.30 से किया जा सकेगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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