


प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र में वर्णित रथनेमी व राजीमति के दृष्टांत का संक्षिप्त विवेचन करते हुए फरमाया कि रथनेमि और राजीमती के दृष्टांत से व्यक्ति को प्रेरणा लेनी चाहिए। ज्ञान के अभाव में रथनेमि संयम लेने के बाद भी मानसिक रूप से मन की भावनाओं को खराब कर लेते हैं, उनके भाव अशुद्ध हो जाते है। जब भाव खराब होते हैं तो चिंतन की धारा बदलती है। जिस तरह हाथी को नियंत्रित करने के लिए अंकुश जरूरी है उसी तरह व्यक्ति के मन को नियंत्रित करने के लिए ज्ञान का अंकुश जरूरी है।
उन्होंने आगे फरमाया कि जब अरिष्टनेमि राजुल से विवाह के लिए जाते हैं राजुल के द्वार पर पहुंचते ही वहां कुछ पशुओं के चित्कार की आवाज सुनाई देती है। पशुओं की चित्कार को सुनकर अरिष्टनेमी अपने मंत्री से पूछते हैं कि यह पशु की चित्कार कैसी सुनाई दे रही है। मंत्री कहता है कि आपके विवाह में जो मेहमान आये हैं वे मांसाहारी है और उनके भोजन के लिए पशुओं का वध किया जा रहा है। यह सुनकर अरिष्टनेमि के मन को आघात लगता है और वे बिना विवाह किये ही लौट जाते हैं कि मेरे कारण इन मुक प्राणियों का वध किया जा रहा है और वे संयम धारण कर मुनि बन जाते हैं। दूसरी ओर राजुल भी अरिष्टनेमि के लौट जाने पर संयम धारण कर साध्वी बन जाती है।
उन्होंने संक्षिप्त दृष्टांत के माध्यम से फरमाया कि अरिष्टनेमी और राजीमति ने जीव को महत्त्व दिया उन्होंने संसार को त्यागकर अपने मन को जीतकर संन्यास ग्रहण किया। इस प्रकार जो व्यक्ति अपने मन पर अंकुश रखता है वह अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकता है।
इससे पूर्व युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने छब्बीसवें अध्ययन ‘सामाचारी’ की 53 गाथा, सत्ताईसवें अध्ययन ‘खलुंकीय’ की 17 गाथा एवं अठाईसवें अध्ययन ‘मोक्षमार्ग-गति’ की 36 गाथा का मूल वांचन किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 21वें अध्ययन समुद्रपालीय, 22वें अध्ययन रथनेमीय का वर्णन करते हुए रोचक विवेचन किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने समुद्रपालीय के दृष्टांत में फरमाया कि समुद्रपालीय अपनी रानी के साथ महल के झरोंखे से नगर की शोभा को देख रहा थे, उसी समय राजा के सैनिक द्वारा एक अपराधी कोे मुंह काला कर सिर मुण्डवा कर नगर के रास्तों से वध स्थल की ओर ले जाया रहा था। समुद्रपाल ने इस घटना को देखा तो उनका मन विचलित हो जाता है और मन ही मन ध्यान करते हुए अंतर गहराईयों में चले जाते हैं और वैराग्य जाग जाता है। वे माता-पिता की आज्ञा लेकर दीक्षा लेते हैं और जंगल में ध्यान साधना कर मुक्ति की ओर आगे बढ़ते हैं। समुद्रपालीय का दूसरों के कष्टों को देखकर मन में वैराग्य जाग जाता है। जीवन की घटनाओं व संसार में व्याप्त दुखों को देखकर अनेक राजाओं, राजकुमारों ने संसारिक सुख त्यागकर दीक्षा ग्रहण की और अपने जीवन से सिद्ध बुद्ध मुक्त हो गए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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