


प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उपस्थित श्रद्धालुओं को अपने उद्बोधन में फरमाया कि दीपावली के पावन दिनों में सभी श्रद्धालु 21 दिवसीय अनुष्ठान श्री उत्तराध्ययन सूत्र का वांचन सुन रहे हैं, इस सूत्र में त्याग, वैराग्य और वीतरागता के बारे में विश्लेषण देखने को मिलता है। जिस तरह मक्खी श्लेष्म में फंस जाती है वैसे ही मनुष्य इस संसार के राग में फंसा हुआ है।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति का अपने तन, मन और धन के प्रति राग होता है। सबसे ज्यादा व्यक्ति का राग पुद्गलों के प्रति होता है, जिसे अपना मानकर उसमें फंसता जाता है। वस्तु, व्यक्ति, स्थान के प्रति राग भाव होने के कारण दिन-रात उसी का चिंतन चलता रहता है। यदि वह आंख बंद करके ध्यान करने के लिए बैठता है तो उसे राग भाव के कारण वस्तु, स्थान आदि के विचार चलते रहते हैं। सुखी होने के लिए विचारों से मुक्त होने की कला सीखनी चाहिए और वह राग को कम किये बिना संभव नहीं हो सकती, इसलिए निर्विचार रहने के लिए सबसे पहले राग, मोह, ममत्व का त्याग करना होगा।
उन्होंने आगे फरमाया कि त्याग की भावना के साथ जो साधक, मन वचन, काया पर नियंत्रण करता है, संयम की साधना करता है वह निर्लेप जीवन जीता है, जिस प्रकार भरत चक्रवर्ती का विशाल साम्राज्य था, बाहुबली जो शरीर से भी विशाल थे किंतु वे भीतर से निर्लेप रहे। जो साधक भीतर से आत्मा में स्थित रहते हुए संयम साधना में रत है वह मोक्ष की ओर गतिमान है।
सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानना मिथ्यात्व है। व्यक्ति अपने स्वयं का अवलोकन करे कि वह कितना विभाव में जी रहा है और कितना स्वभाव में है। इस शरीर का उपयोग जीव के लिए करेंगे तो मनुष्य जीवन की सार्थकता होगी।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने तेईसवें अध्ययन केशी गौतमीय की 89 गाथा का मूल वांचन किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 19वें अध्ययन मृगापुत्रीय का विवेचन करते हुए फरमाया कि मृगापुत्र महल के झरोखे से राजपथ की चहल-पहल को देखता है और उस समय एक मुनि विचरण कर रहे होते हैं तो मृगापुत्र की नजर उस पर पड़ती है उनकी ईर्यासमिति युक्त चाल चलन को देखकर विचार करते-करते हुए आभास होता है कि मैंने ऐसे मुनि को पहले कहीं देखा है और उन्हें ध्यान में जाति स्मरण ज्ञान हो जाता है। अपने पूर्व भव को देखकर मृगापुत्र को वैराग्य जाग जाता है। अपने माता-पिता से लंबे संवाद के बाद माता-पिता की आज्ञा लेकर दीक्षित हो जाते हैं और मृग की भांति चर्या का पालन करते हैं।
आज जामनेर जिला जलगांव से मुमुक्षु डॉ. कोमल छाजेड़ परिवार सहित गुरु दर्शन एवं दीक्षा आज्ञा हेतु उपस्थित हुई। ज्ञातव्य है कि मुमुक्षु की दीक्षा उपप्रवर्तिनी महासाध्वी डॉ. सत्य साधना जी म.सा. के सान्निध्य में 16 जनवरी 2026 को महाराष्ट्र के जामनेर में संभावित है। मुमुक्षु बहन का अवध महिला मण्डल द्वारा स्वागत-सम्मान किया। मुमुक्षु बहन कोमल छाजेड़ ने भी अपनी भावनाएं व्यक्त की।
इस अवसर पर पूना श्रीसंघ के वरिष्ठ श्रावक श्री जुगराज पारलेचा, श्री बालचन्द संचेती, श्री पोपटलाल ओस्तवाल, श्री विलास राठौड़ आदि गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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