वीतरागता ही श्रमण संस्कृति का लक्ष्य है |

- आचार्य शिवमुनि

11 OCTOBER 2025

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. संजीवनी हॉस्पिटल से आज शनिवार को प्रातः विहार कर अवध संगरीला पधारे। आचार्य भगवन के अवध संगरीला पधारने पर अवध निवासियों में खुशी की लहर छा गई। आचार्य भगवन का अवध पधारने पर रंगोली, कलश एवं जयकारे के साथ अवध निवासियों ने स्वागत किया। डॉक्टर के परामर्श अनुसार आचार्य भगवन के दर्शन दूर से ही करने की सलाह दी गई। इंफेक्शन को ध्यान में रखते हुए विहार सेवा में आए श्रद्धालुओं ने आचार्य भगवन के दूर से ही दर्शन एवं मंगल पाठ श्रवण कर धन्यता का अनुभव किया।

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. दीपावली तक मौन एवं एकांत साधना में रहेंगे। आचार्य भगवन से प्रातः 10 बजे एवं सायं 5 बजे दर्शन एवं मंगल आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे। चतुर्विध संघ अपने विवेक का परिचय देते हुए पूर्ण स्वस्थता के बाद ही दर्शन करने का प्रयास करेंगे तो आचार्य भगवन के स्वास्थ की दृष्टि से अच्छा रहेगा।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने उद्बोधन में फरमाया कि श्री उत्तराध्ययन सूत्र में वैदिक संस्कृति एवं श्रमण संस्कृति दोनों का विवेचन पढ़ने को मिलता है। वैदिक संस्कृति जहां समाप्त होती है वहां से जैन दर्शन प्रारंभ होता है। प्राचीन काल में वैदिक मान्यता थी कि जिसका पुत्र नहीं होता है वह स्वर्ग में नहीं जा सकता। दान पुण्य जो करते हैं अनुष्ठान करते हैं वे सब व्यर्थ हो जाते हैं। जबकि श्रमण संस्कृति कहती है जिसे आत्मा और शरीर दोनों का बोध हो गया है, जो आत्म तत्व को जान लेता है कि इस संसार में अपनी आत्मा के अलावा कुछ नहीं है, सब पराया है। शरीर, माता-पिता, स्वजन आत्मा से अलग हैं। जब वैराग्य जाग जाता है तो वह साधु बन सकता है। श्रमण संस्कृति में त्याग वैराग्य की बात कही गई है। वीतरागता ही साधक का लक्ष्य है।

श्री शमित मुनि जी म.सा. ने अठारहवें अध्ययन संजयीय की 54 एवं उन्नीसवें अध्ययन मृगापुत्रीय की 99 गाथा का मूल वांचन करते हुए उद्बोधन में फरमाया कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में पाप पुण्य होता है। जिस तरह हिरण के झुण्ड में कोई शेर आक्रमण करता है तो उस झुण्ड में एक हीरण को उठाकर ले जाता है और बाकी हिरण देखने लग जाते हैं, वैसे ही शेर काल का प्रतीक है और हिरण मनुष्य स्वयं है। जब काल आकर व्यक्ति को ले जाता है तो परिवार देखता ही रह जाता कोई किसी को रोक नहीं सकता। इसलिए जन्म-मरण के काल चक्र को समझना चाहिए। व्यक्ति का अंत समय आता है तो उसे कोई भी बचा नहीं सकता है, इसलिए इस सत्य को समझकर अपनी आत्मा के कल्याण का चिंतन करना ही हितकर है।

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