

प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने ध्यान का प्रयोग करवाया।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने चौदहें अध्ययन ‘इषुकारीय’ की 53 गाथा एवं पन्द्रहवें अध्ययन ‘स-भिक्षु’ 16 गाथाओं का मूल वांचन के साथ विवेचन किया।
श्री शमित मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि जैन दर्शन में मानव जीवन प्राप्त करने के लिए घाति कर्मों का क्षयोपशम होना जरूरी है। पुण्य प्रकृति से भौतिक सुखों की प्राप्ति तो हो जाती है, किंतु मानवता का विकास नहीं होता है। अंकुरित होने में समर्थ बीज भी अनुकूल सामग्री के मिलने पर ही अंकुरित, पल्लवित, पुष्पति और फलित हो सकता है। उर्वरा भूमि हो समय-समय पर खाद्-पानी मिलता रहे साथ में सूर्य, चन्द्रमा और वायु का समुचित योगदान मिलने पर बीज वृक्ष बन जाता है। इसी प्रकार आत्मा भी अनुकूल सामग्रियों से उत्तरोत्तर विकास करता हुआ परमात्मा पद को प्राप्त कर सकता है।
श्री शमित मुनि जी म.सा. आगे फरमाया कि संसार में मनुष्य जीवन मिलना दुर्लभ है और मनुष्य जन्म के बाद प्रभु की वाणी मिलना और भी दुर्लभ है। मनुष्य का जीवन पेड़ के पत्ते की तरह है। पत्ते की कोंपल खिलती है हरा होता, पीला पड़ जाता है, सुखता है और फिर गिर जाता है। कई पत्ते हवा के झोंके कारण सुखने से पहले ही गिर जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य के जीवन का भी पर्याय बदलता रहता है जो कभी आयुष्य पूर्ण होने से पहले ही संसार से चले जाते हैं।
उन्होंने बहुश्रुत का विश्लेषण करते हुए फरमाया कि जो आगम शास्त्र के तत्वों का विशेषज्ञ होता है। जिसका श्रुत ज्ञान आभा-मण्डल की तरह दसों दिशाओं को प्रकाशित करता है उसे बहुश्रुत कहते हैं। जिसने गुरु मुख से गुरु वचनों को सुनकर उसके मर्म को समझ लिया है वह बहुश्रुत है। बहुश्रुत सभी जगह पूजनीय होता है। जो मुनि विद्या और चारित्र से उन्नत है वह बहुश्रुत है। आचार्य, उपाध्याय, गणी और प्रवर्तक इनमें कोई भी महामुनि बहुश्रुत हो सकता है।
बहुश्रुत के लक्षणों की चर्चा करते हुए आगे फरमाया कि बहुश्रुत के आठ लक्षण है जो अपने मनोरंजन के लिए दूसरों की हंसी नहीं उड़ाता है। जो इन्द्रियां और मन का दमन करता है। दूसरे का भेद नहीं बताता है। चारित्र की आराधना करता है। जो चारित्रवान होता है। जो पदार्थों में आसक्त नहीं होता है। जो सत्य पर श्रद्धा करता है।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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