




आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने जनमानस को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि वह व्यक्ति बुद्धिमान है जो अपना समय निज आत्मा को देता है, आत्मा को जानता है, आत्मा पर श्रद्धा करता है क्योंकि वह जानता है कि आत्मा ही अजर-अमर है। शरीर तो नश्वर है जो एक दिन मिटने वाला है। शरीर में जब तक आत्मा है तब तक सब उसे प्रेम करते हैं, शरीर को महत्त्व देते हैं और जब शरीर से आत्मा निकल जाती तो उस शरीर को एक घण्टा भी घर में रखना नहीं चाहते, इसलिए इस सच्चाई को समझना है कि आत्मा ही सब कुछ है।
उन्होंने आगे फरमाया कि धनी व्यक्ति धन होते हुए भी दुःखी है रात को आराम से सो नहीं सकता और एक मजदूर व्यक्ति कुछ नहीं होते हुए भी आराम से नींद लेता है। आत्म दृष्टि से कोई किसी को सुख-दुःख नहीं देता। यह सुख-दुःख भी दिमाग की कल्पना मात्र है, इसलिए सुख-दुःख से उपर उठकर निज तत्व में रहे, आत्मा में स्थित रहें तो आत्मा के सुख को पहचान सकते हैं।
उन्होंने यह भी फरमाया कि कई ऐसे परिवार भी हैं जो आपस में एक दूसरे से बात नहीं करते क्योंकि वे उलझे हुए हैं, सुलझे हुए नहीं है। परिवार में कोई भी समस्या हो उसे साथ बैठकर सुलझाना चाहिए, परस्पर प्रेम भाव के साथ रहना चाहिए।
आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि मनुष्य का जीवन ओस की बूंद के समान है, सुबह सूर्य उदय के साथ ही वह पानी की ओस मिट जाती है, इसलिए इस ओस रूपी अल्पकालीन मनुष्य जीवन को समझते हुए अपनी आत्मा का कल्याण करना चाहिए।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि सम्यक् दृष्टि सदा अमूढ़ है। मिथ्या दृष्टि सदा मूढ़ है। मूढ़ वह है जिसे सत्य और असत्य का भान नहीं है। मिथ्यादृष्टि वाला व्यक्ति चौबीसों घंटे कर्म बांधकर अपने ही जीव को अधोगति की ओर ले जाने का कार्य करता है। सम्यक्दृष्टि वाला व्यक्ति अमूढ़ बनकर सबमें जीवात्मा के दर्शन करता है। सम्यक्त्वी किसी दूसरे के शरीर और पुद्गल की वृत्तियों पर ध्यान नहीं देता। सबमें आत्मा देखता है जिससे आत्मा का पोषण होता है। जहां विकल्प है वहां शुक्ल ध्यान नहीं हो सकता।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘मिलता है सच्चा सुख केवल भगवान तुम्हारे चरणों में’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
चण्डीगढ़ से आए श्री नीरज जैन ने चण्डीगढ़ श्रीसंघ की ओर से अपनी भावनाएं व्यक्त की। मेरठ से श्रीमती प्रतिभा जैन ने भजन के द्वारा अपना भावनाएं व्यक्त की।
आचार्य भगवन के दर्शन हेतु चण्डीगढ़ श्रीसंघ के साथ दिल्ली, मेरठ, हैदराबाद, फरीदाबाद, भोपाल, पाली आदि स्थानों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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