जीवन को रूपांतरित करें |

- आचार्य शिवमुनि

22 SEPTEMBER 2025

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जीवन में समभाव जरूरी है और समभाव सरलता से और सरलता मिथ्यात्व को तोड़कर जड़-जीव के भेदज्ञान से आती है। सम्पूर्ण लोक में आत्मा विद्यमान है और आत्मा का स्वभाव है ज्ञाता-दृष्टा भाव में रहना अर्थात जानना और देखना।

उन्होंने आगे फरमाया कि आज विश्व में जो युद्ध हो रहे हैं, वे अहंकार के कारण हो रहे हैं कोई भी देश झुकना नहीं चाहता। युद्ध के कारण नुकसान के साथ हिंसा हो रही है। परिवार में भी यदि एकता, परस्पर प्रेम, समभाव नहीं है तो झगड़े होते हैं। व्यवहार और आत्म दृष्टि के अनुसार व्यक्ति का जीवन एक दूसरे के सहयोग से चलता है जिसमें पहला सहयोग मां का, दूसरा पिता का, तीसरा गुरु का और चौथा सहयोग अपने हृदय का है जो चौबीसों घंटे धड़कता रहता है। जीवन के लिए प्रकृति का भी बड़ा सहयोग है। मनुष्य स्वभाव से एक दूसरे से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने आगे फरमाया कि जैन दर्शन कर्मसिद्धांत पर विश्वास करता है कि जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। व्यक्ति मन से भी अनेक कर्मों का बंधन कर लेता है, क्योंकि मन चंचल होता है, इसलिए मन के पीछे नहीं भागना चाहिए।

उन्होंने यह भी फरमाया कि अध्यात्म प्रकरण के अनुसार किसी ने गाली दी और उसे समभाव से सहन कर लिया तो 66 करोड़ उपवास के बराबर पुण्य बताया है। व्यक्ति अपने जीवन का रूपांतरण कर जैसा चाहे वैसा बन सकता है।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि शरीर से जुड़े व्यक्ति स्थान को हम अपना मानते हैं तो वह मोह का पोषण हैं मैं शरीर यह मिथ्यात्व है। स्थान वस्तु मेरी यह मिथ्यात्व का पोषण है। शरीर की चिंता, शरीर की साता ढूंढना, शरीर का ध्यान रखना वह आर्त्त-रौद्र ध्यान है। इसका पोषण मोह शत्रु का पोषण है जबसे इस भव में होश संभाला है तब से हम यही कर रहे हैं। जब जो शरीर मिला उसके माध्यम से शरीर का पोषण कर पांच आश्रव के द्वार खोल दिये इनसे व्यक्ति कर्म बंधन में लगा रहता है।

युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘तूझे देखना इबादत, तेरी याद बंदगी है’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।

आज रानियां (हरियाणा), विजयनगर (राजस्थान), जोधपुर, उदयपुर आदि जगहों से श्रद्धालु आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित हुए।

विजयनगर से श्री प्रवीण संचेती ने आचार्य भगवन के सान्निध्य में पहुंचकर 93 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से तपस्वी का शॉल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया।

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