


आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित श्रीसंघ को सम्बोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि हम सभी सौभाग्यशाली हैं कि इस पंचम काल में हमें अरिहंत परमात्मा वाणी श्रवण करने का अवसर मिल रहा है दूसरी बात कि हमें जैन धर्म मिला। जैन धर्म में ध्यान का विशेष महत्व है। परिवार में माता-पिता भी अपने बच्चों को सीख देते हैं कि ध्यान से चलना, ध्यान से पढ़ना, ध्यान से खेलना इस प्रकार हर कार्य में ध्यान शब्द का उपयोग किया जाता है। ध्यान शब्द तो बहुत सुना होगा किंतु आत्म ध्यान क्या है यह प्रश्न सभी के मन में हो सकता है। आत्म ध्यान के द्वारा व्यक्ति को आत्मा से आत्मा में स्थित करने की कला को सिखाया जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि आत्मा केवल शब्द नहीं है इसके साथ भेद विज्ञान है जिसमें आत्मा और शरीर का भेद किया जाता है आत्मा अलग है और शरीर अलग है। शरीर के आकार में निराकार आत्मा को देखना और जानना ही आत्म ध्यान है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि संसारी व्यक्ति का परिवार में माता-पिता, भाई-बहन, मित्र, संबंधी के प्रति मोह ममत्व होता है, किंतु जो आत्मार्थी व्यक्ति है वह अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए अलिप्त रहकर मोह में नहीं फंसता है।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया सम्यक्त्वी व्यक्ति प्रतिकूलता को सहन करता है और वह उसे अपने कर्मों की निर्जरा मानता है। भगवान महावीर ने राजघराने में जन्म लिया सब सुख सुविधा होते हुए भी उन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए जंगल में जाकर कठिन साधना की अनेक उपसर्गों को सहन कर निर्वाण को प्राप्त हुए।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘वह जीवन धन्य है जो गुरुवर की शरण आता’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुत किया।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘मुझे तुमने गुरुवर बहुत कुछ दिया’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
गडोदरा से श्री संघ आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित होकर अपनी भावनाएं व्यक्त की। इसके अलावा महाराष्ट्र के श्रीरामपुर, दिल्ली आदि स्थानों से श्रद्धालु उपस्थित हुए।
विशेष – श्री ऑल इण्डिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस आत्म ध्यान प्रसार योजना के तहत जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर दिनांक 16 सितम्बर 2025 को प्रातः 8 बजे से 11 बजे तक 3 घंटे ऑनलाईन आत्म ध्यान साधना शिविर का आयोजन होगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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