

आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने उपस्थित धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि कोई भी पक्षी पिंजरे में कैद नहीं रहना चाहता, चाहे वह पिंजरा सोने का ही क्यों न हो? वह खुले आकाश में उड़ान भरना चाहता है, यह शरीर भी पिंजरा है। इस जीव ने पिंजरे की तरह अनेक भव बदले पर मुक्त नहीं हुआ, इसका मुख्य कारण है कि मुक्त होने के लिए भीतर से गहरी प्यास नहीं जगी। हम मुक्त होने के लिए इस मानव शरीर के द्वारा कर्मों के बंधन को काटकर निज जीव में स्थित होने का प्रयास करें। जीव का जीव में ठहर जाना ही आत्म साधना है और आत्म साधना के द्वारा ही मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है।
आचार्य श्री जी ने आगे फरमाया कि जो समय बीत जाता है वह कभी लौट कर नहीं आता, इसलिए व्यक्ति न भविष्य की चिंता करे और न ही भूतकाल की, जो वर्तमान क्षण है उसी में रहने का प्रयास करे। वर्तमान क्षण में रहना ही एक तरह का ध्यान है और यह कर्मों के बंधन से दूर रहने की विधि भी है। दुःख का कारण अज्ञानता है, जो ज्ञानी होता है वह सुख को प्राप्त करता है ज्ञान भी भीतर से आता है।
प्रमुखमंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उदबोधन में फरमाया मनुष्य पंचेन्द्रिय शरीर में जन्म लेने के बाद भी अज्ञानता के कारण पर व पुद्गल को अपना मानता है। अरिहंत परमात्मा की वाणी के अनुसार यदि दो घड़ी अपने में ठहर जाओगे तो परमात्मा बन जाओगे। जीव अजीव दोनों परिवर्तनशील है जीव उदय कर्म के अनुसार पर्याय बदलता रहता है। मोक्ष मार्ग के लिए शारीरिक मेहनत की आवश्यकता नहीं है। पुण्य की कमाई से यह मानव शरीर मिला है तो अब इसके रख रखाव की ओर ध्यान न देते हुए, पुद्गल की चिंता और चिंतन ना करते हुए हमें एक शुद्ध सामायिक करनी हैं। शुभ और अशुभ दोनों का चिंतन छोडकर शुद्ध की ओर आगे बढ़ना है। शुद्ध सामायिक शुक्ल ध्यान की सामायिक है।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘ले शरण तेरी करें, भव पार हम’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुत किया।
आज श्री पीह जैन संघ राष्ट्रीय संघ समिति के 150 व्यक्तिय आचार्य भगवन के दर्शन हेतु उपस्थित हुए। इसके अलावा चैन्नई, उदयपुर आदि जगहों से श्रद्धालु उपस्थित हुए। चैन्नई से श्रीमती सूरज बाई ने भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।
ऑनलाईन के माध्यम से आदीश्वर धाम कुप्पकलां से साधिका श्रीमती मंजू जैन ने 105 एकासन का प्रत्याख्यान लिया। प्रत्यक्ष रूप से श्रीमती श्वेता मेहता ने 24 एकासन का प्रत्याख्यान लिया।
शुक्रवार (12 सितम्बर, 2025) को बालोतरा से प्रसिद्ध भजन गायक श्री वैभव बाघमार आचार्य श्री जी के दर्शन हेतु आये। बाघमार ने कहा कि मेरी बहुत वर्षों से इच्छा थी की आचार्य श्री जी के दर्शन करूं आज साक्षात् आपश्री के दर्शन कर मुझे प्रसन्नता हो रही है, इस अवसर पर उन्होंने ‘‘गुरु के मिले चरण मेरे रोम खिल गए’’ भजन के द्वारा अपनी भावनाएं व्यक्त की।
ज्ञातव्य है कि आचार्य श्री जी के 84वें प्रकाशोत्सव से पूर्व 17 सितम्बर 2025 को भजन संध्या में वे अपनी प्रस्तुति देंगे।
विशेष – श्री ऑल इण्डिया श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस आत्म ध्यान प्रसार योजना के तहत जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर दिनांक 16 सितम्बर 2025 को प्रातः 8 बजे से 11 बजे तक 3 घंटे ऑनलाईन आत्म ध्यान साधना शिविर का आयोजन होगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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