पुद्गल आत्मा को सुख नहीं देता |

- आचार्य शिवमुनि

25 AUGUST 2025

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के छठे दिन अवध संगरीला के बेंक्विट हॉल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि व्यक्ति अपनी आत्मा में स्थित रहने के लिए यह भावना रखे कि उसे अपनी आत्मा में स्थित होना है और स्थित होने के लिए मिथ्यात्व को तोड़ना है। भगवान महावीर को बीस-बीस उपसर्ग आये किन्तु उन्होंने अपनी देह को अपना माना नहीं, देह और आत्मा का भेद कर दिया। देह पर जो उपसर्ग आये उसे पूर्व कर्म बन्धन मानकर सब कुछ समता से सहन किया।

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि जीव का गुण है ज्ञाता-दृष्टा भाव में रहना किसी भी घटना स्थिति को केवल देखें। घटना के प्रति मोह-मिथ्यात्व का पोषण नहीं करें, जीवात्मा तो एक शाश्वत सम्पन्न परिपूर्ण है। कार्मण शरीर पर पड़े कर्मों को क्षय करने के लिए अनुकूलता की चाह नहीं हो।

आचार्य भगवन ने आगे फरमाया कि जीव को कोई भी पुद्गल सुख नहीं दे सकता। जिस प्रकार रात्रि में सूर्य की किरणों के आताप को ढूंढना अज्ञानता है, उसी तरह पुद्गल में सुख ढूंढना अज्ञानता है। अनुकूलता की चाह को पाप समझना और प्रतिकूलता का विरोध नहीं करना, उनके प्रति तटस्थ भाव रहे कोई निंदा नहीं करना इस तरह की भावना ही मोक्ष का द्वार खोलती है।

युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने श्री अंतकृत दशांग सूत्र में अर्जुन माली के संसारी जीवन व साधु के जीवन का रोचक प्रसंग सुनाया।

धर्म सभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।

आत्म भवन में प्रात 7.00 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान के प्रयोग के द्वारा अरिहंत प्रभु की वाणी में फरमाया जड़ जीव का भेद करते हुए अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त करना है। संसार की चर्चा नहीं करना और न ही संसार की चर्चा करने वालों की ओर देखना, न ही उनका अनुसरण करना। हे जीव! आत्मा में उतरकर आगे बढ़ तो कल्याण होगा।

पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर किया जा रहा है।

शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री अशोक मेहता ने बाहर से आए हुए अतिथियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।

आज की प्रभावना श्री अनिल मेहता एवं श्री जसवंत कोठारी की तरफ से थी।

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