पुद्गल के चिंतन का त्याग सबसे बड़ा त्याग है |

- आचार्य शिवमुनि

22 AUGUST 2025

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के तीसरे दिन अवध संगरीला के बेंक्विट हॉल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि सत्य आत्मा है। अरिहंत प्रभु की वाणी में किसी भी पुद्गल का चिंतन करना सबसे बड़ा त्याग बताया हैं। रिश्ते-नाते, परिवार, संसार, धन-वैभव आदि पुद्गल की श्रेणी में आते हैं। व्यक्ति, वस्तु, स्थान, जिसे अपना मान रखा है यह सारा पुद्गल है इस पुद्गल का चिंतन छोड़ना ही सबसे बड़ा त्याग है।

उन्होंने आगे फरमाया कि प्रभु की अनंत कृपा सें हमें प्रभु की वाणी भरत क्षेत्र के इस पंचम काल में सुनने को मिल रही है। पर्युषण पर्व पर प्रभु की आठ दिनों की वाणी अमृत तुल्य है। महाविदेह क्षेत्र में तीर्थंकर भगवान भी चातुर्मास करते हैं, समवसरण की रचना होती है और सभी जीव उनके समवसरण में जाकर प्रभु की वाणी सुनते हैं। इन विशेष पर्व के दिनों में जिन्हें अरिहंत प्रभु की वाणी सुनने का अवसर मिला है वे सौभाग्यशाली है।

आचार्य भगवन ने प्रभु कौन? प्रश्न का समाधान करते हुए फरमाया कि जो समर्थ है अर्थात् आत्मार्थी है वह प्रभु है। जिन्होंने गाथाएं लिखी वे महापुरुष बन गए और जिन्होंने आत्म तत्व को जी लिया, गहरे भीतर आत्मा में लीन हो गए, वे आत्मार्थी बनकर अपने संसार सागर को पार कर गए।

उन्होंने आगे वायु काय के जीवों के बारे में फरमाया कि वायु से भी अनेक जीवों की हिंसा होती है। एक मुनि छह काया जीव की हिंसा नहीं करता उसमें वायु काय के जीव भी सम्मलित है मुनि वायु काय के जीवों की भी रक्षा करता है।

उन्होंने पर्युषण महापर्व पर श्रावकों को त्याग एवं दान की प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि पर्युषण महापर्व पर जहां आवश्यकता है जीव दया आदि सद्कार्यों के लिए अपने संचय धन में से आनन्द एवं उल्लास के साथ कुछ दान अवश्य करना चाहिए जिससे अनंत कर्मों की निर्जरा होती है।

युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने आज सूत्र के विवेचन में तृतीय वर्ग के अंतर्गत सद्गृहस्थ को साधु को देखकर कैसे उत्तम भाव आने चाहिए व साधु को किन भावों से आहार दान देना चाहिए आदि बतलाते हुए महाराणी देवकी का रोचक वर्णन सुनाया।

धर्म सभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया।

आत्म भवन में प्रात 7.00 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान के प्रयोग के द्वारा अरिहंत प्रभु की वाणी में बताया कि जहां पुद्गल का चिंतन समाप्त होता है वहीं से वीतराग यात्रा प्रारंभ होती है।

पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर किया जा रहा है।

आज की प्रभावना श्री तुलसीभाई चपलोत एवं श्री शौकिन पोरखना की तरफ से थी।

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