





आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने पर्युषण पर्व के दूसरे दिन अवध संगरीला के बेंक्विट हॉल में उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि आत्मार्थी साधक जड़-जीव का भेद कर सार तत्व को ग्रहण कर निस्सार तत्व को भूल जाता है। जीव की अनंत गहराई में जाकर आत्म तत्व का अनुभव करने से साधना प्रकट होती है। भगवान की वाणी में बताया गया है कि शरीर की पांचों इन्द्रियों से आत्मा का कोई वास्ता नहीं है चाहे वह प्रतिकूल है या अनुकूल है।
उन्होंने आगे सेठ सुदर्शन के दृष्टांत में फरमाया कि सेठ सुदर्शन पर रानी झूठा लांछन लगा देती है, लेकिन सेठ सुदर्शन को विचार आता है कि यदि मैं कह दूंगा कि झूठा लांछन लगाया है तो रानी को फांसी हो जाएगी। इस कारण सेठ सुदर्शन कुछ नहीं बोलता और विचार करता है कि यह सब मेरे अपने ही कर्मों के कारण हुआ है। सेठ सुदर्शन को शूली पर चढ़ाते हैं उस समय देव वाणी आती है कि सेठ सुदर्शन को झूठी सजा दी जा रही है इस प्रकार आत्मार्थी सेठ सुदर्शन बच जाता है। सेठ सुदर्शन की धर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धा थी। उसी दृढ़ श्रद्धा से वे बच गये।
उन्होंने यह भी फरमाया कि श्रावक का यह भी कर्त्तव्य है कि वह पर्युषण महापर्व पर अपनी श्रद्धा अनुसार निस्वार्थ भाव से त्याग की भावना रखंे। जिन संस्थाओं में धार्मिक गतिविधियां, शिविर, भोजनशाला आदि संचालित होते हैं वहां वह स्वेच्छा से दान करते हैं तो कर्म निर्जरा के भागीदार बनते हैं।
उन्होंने ‘‘माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय’’ सूक्ति का उल्लेख करते हुए फरमाया कि भगवान की वाणी जितनी बार सुनते हैं उतना ही मिथ्यात्व टूटता है और समय आने पर धीरे-धीरे साधक अपनी आत्मा में स्थित रहने की कला को जान लेता है।
उन्होंने सती मदालसा के दृष्टांत में फरमाया कि जीवन में संस्कार का बहुत महत्त्व है। छोटे बच्चों को जैसा संस्कार देते हैं वैसा ही उनका जीवन होता है, सती मदालसा ने सात पुत्रों को जन्म से पूर्व ही धर्म के उत्तम संस्कार दिये और उन्हें संन्यासी बना दिया।
धर्म सभा के प्रारंभ में प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी ने श्री अंतकृतदशांग सूत्र का मूल वांचन किया और युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने सूत्र के विवेचन में चम्पा नगरी एवं द्वारिका नगरी का वर्णन करते हुए गौतम अणगार की मुक्ति का रोचक वर्णन सुनाया।
आत्म भवन में प्रात 7.00 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान का प्रयोग करवाया।
पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल पर किया जा रहा है।
आज की प्रभावना श्री गोपाल विजय जी गन्ना एवं श्री गौतम मेहता की तरफ से थी
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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