



आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में आज (20 अगस्त) से आठ दिवसीय पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का शुभारंभ हुआ। पर्युषण पर्व के प्रथम दिन आचार्य भगवन ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि महापर्व पर्युषण जाप, स्वाध्याय, सामायिक, पौषध, प्रतिक्रम, त्याग प्रत्याख्यान का विशेष पर्व है, इस पर्व के दौरान व्यक्ति धर्माराधना कर अपने संचित कर्मों को काटकर जीवन को हल्का करता है। इस पर्व के आठ दिनों में कई श्रावक प्रतिष्ठानों को बंद कर खूब धर्म आराधना, स्वाध्याय करते हैं। एक साधना करने वाला साधक या साधु प्रतिदिन प्रतिलेखन करते हैं जैसे कहीं कपड़े के अंदर बाहर कोई जीव तो नहीं है बर्तन में कहीं जीव तो नहीं है। यह बाहर का प्रतिलेखन है, इसी तरह मन, वचन, काया से प्रतिलेखन करते हैं कि किसी को ऊंचा-नीचा, व्यवहार में कहीं कटूता आई तो उसका भी प्रतिलेखन करते हैं। व्यक्ति का मन बहुत चंचल होता है प्रतिलेखन, स्वाध्याय का समय होता है तब मन करता है कि अभी समय है बाद में कर लेंगे इस तरह से मन बहुत भटकाता है, इसलिए मन के पीछे नहीं भागना चाहिए।
आचार्य भगवन ने ‘साधु कौन होता है?’ प्रश्न के उत्तर में फरमाया कि साधु वह है जो किसी प्राणी को दुःख नहीं देता, किसी को अभिशाप नहीं देता, जो भिक्षा में मिल जाए वह ग्रहण कर लेता है, जो मिला है उसे बांट कर खाता है और जिस दिन भोजन नहीं मिलता तो भी प्रभु को धन्यवाद देता है कि प्रभु आज आपने उपवास की कृपा कराई इस तरह की भावना वाला सच्चा साधु होता है और वह कर्मों की निर्जरा कर आत्म तत्व की ओर गतिमान होता है।
इससे पूर्व युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. एवं प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘यह पर्व पर्युषण आया है’’ सामुहिक रूप भजन की प्रस्तुति दी।
युवामनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. अंतकृतदशांग सूत्र वाचन में फरमाया कि लोगों की आम बोलचाल की भाषा में उपदेश देना चाहिए जिससे हर व्यक्ति को समझ में आ सके। भगवान महावीर ने जो उपदेश दिये आगमों के विषय जो सामान्य जनता को समझाया जा सकता था।
प्रात 6.30 बजे वीतराग साधिका निशाजी ने शुक्ल ध्यान का प्रयोग करवाया। साक्षात् अरिहंत प्रभु की वाणी में फरमाया हे! जीवात्मा अनेक भवों में यह जीव भटका है इस भटकाव को रोकना है और अपने स्वरूप में स्थित होना है।
पर्युषण पर्व पर दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, जम्मू आदि क्षेत्रों से श्रावक-श्राविकाएं पर्युषण पर्व पर विशेष रूप उपस्थि होकर धर्माराधना कर रहे हैं।
पर्युषण पर्व के कार्यक्रम का सीधा प्रसारण जैनाचार्यजी यू-ट्यूब चैनल किया जा रहा है।
पर्वाधिराज पर्युषण में धर्माराधनारत श्रद्धालुओं के आवास भोजन की सुन्दर व्यवस्था शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से की गई है।
आज की प्रभावना श्री नवीन मोन्टू भाई व श्री अर्जुन भाई मिस्त्री के तरफ थी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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