
आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि संसार सागर में जन्म-मृत्यु, दुःख, रोग, बुढ़ापा सब है। व्यक्ति धर्म के द्वारा इस संसार सागर से पार हो सकता है। पांचों इन्द्रियों के 23 विषय जब जीव के साथ लग जाते हैं तो संसार में जन्म-मरण का चक्र निरंतर चालू रहता है। पांचों इन्द्रियों से परे जब व्यक्ति आत्म स्वभाव में रहता है तो बंधन नहीं होता है। मुनि के पांच महाव्रत हैं और श्रावक के बारह अणुव्रत हैं यदि मुनि अपना धर्म निभाता है और श्रावक अपना धर्म निभाता है तो वह संसार सागर से पार हो जाता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि जो पांचों इन्द्रियों में आसक्त रहता है चाहे वह साधु हो या श्रावक हो वह भगवान की आज्ञा में नहीं है। कई व्यक्ति धर्म ध्यान करते हैं किंतु मन, वचन, काया का गोपन नहीं करने से अंतिम समय में भी मूढ़ हो जाते हैं। जिस संत को शास्त्रों का ज्ञान नहीं है किंतु वह मन, वचन, काया तीनों का गोपन करता है तो वह मुक्ति की ओर अग्रसर होता है। सरलता, पवित्रता, शुद्धता ये आत्मा के निज गुण है।
उन्होंने आठ प्रकार के मद का विवेचन करते हुए फरमाया कि भगवान महावीर को भी मरीचि के भव में मद आ गया कि मैं तीर्थंकर बनूंगा तो उन्हें एक ब्राह्मण के घर जन्म लेना पड़ा। पुण्योदय से अच्छा घर-परिवार, सम्पत्ति मिल जाए तो अभिमान अथवा मद नहीं करना चाहिए। यह संसार कर्मों की खेती है यहां जैसा बीज बोया वैसा ही फल प्राप्त होता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में शेर व बकरियों के दृष्टांत के माध्यम से फरमाया कि एक शेर का बच्चा जो बकरियों के झूण्ड में रहता है तो वह बकरियों की तरह उसका व्यवहार होता है, इसी प्रकार व्यक्ति को अज्ञानवश अपने आत्म स्वरूप का बोध नहीं होने के कारण वह पुद्गलों में सुख ढूंढता है
जब व्यक्ति को आत्मबोध हो जाता है आत्मा की शक्ति को पहचान लेता है तो वह आत्मा को महत्त्व देता है।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘इक देव मेरे अरिहंत नहीं और देव चाहूं’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज बारडोली सूरत से श्री मनीषकुमार शांतिलाल माण्डोत ने 10 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का शॉल, माला, स्मृति चिन्ह द्वारा सम्मान किया।
आज की धर्म सभा में पंजाब के होशियारपुर, दिल्ली, भीलवाड़ा आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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