शुद्ध भावों से दिया गया आहार मुक्ति के द्वार खोलता है |

- आचार्य शिवमुनि

8 AUGUST 2025

आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में अणगार धर्म और आगार धर्म का विवेचन करते हुए फरमाया कि जो भगवान के वचनों को सुनकर छः काय के जीवों की रक्षा करते हैं, गृह त्याग कर साधु बनते हैं और वे अपने समान सभी में जीव आत्मा को देखते हैं वे अणगार धर्म का पालन करने वाले होते हैं। दूसरे वे जो आगार धर्म का पालन करते हैं, ऐसे श्रावक जो घर में रहते हुए भी धर्म की ओर अभिमुख होते हैं वे आगार धर्म का पालन करने वाले होते हैं।

उन्होंने फरमाया कि साधु और श्रावक दोनों का आपस में परस्पर धार्मिक जुड़ाव होता है साधु जब श्रावकों के घरों में आहार आदि के लिए जाते हैं तो श्रावक अपने लिए बने हुए भोजन में से संतों को आहारदान, उपचार आदि के लिए औषधि दान देते हैं, जिस तरह से भंवरा फूलों की खूशबू लेकर फूलों को नुकसान पहुंचाए बिना उड़ जाता है ऐसे ही साधु श्रावकों के घरों से थोड़ा-थोड़ा आहार लेते हैं। श्रावक का भी कर्त्तव्य होता है कि कोई भी साधु आए तो उन्हें शुद्ध भाव से आहार देना चाहिए। शुद्ध भावों से दिया गया आहार आपके मुक्ति के द्वार खोलता है। श्रावक भोजन के पूर्व अवश्य यह प्रार्थना करे कि कोई साधु तपस्वी मुनि मेरे घर से आहार ग्रहण करे। आप यात्रा आदि के लिए जाएं तो अपने साथ प्रासुक भोजन एवं जल अवश्य रखें और मार्ग में दिखने वाले साधु-संतों को आहार पानी की विनती करें इससे अनंत गुणा लाभ मिलता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि जिस प्रकार अग्नि का स्वभाव गर्म और पानी का स्वभाव ठण्डा इसी प्रकार आत्मा का स्वभाव ज्ञाता-दृष्टा है। जो व्यक्ति स्वभाव में रहता है वह कर्मों की निर्जरा करता है और विभाव दशा में रहता है तो संसार को बढ़ाता है।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि पांच समिति, तीन गुप्ति की अखण्ड आराधना करने वाला संत मोक्ष को प्राप्त करने वाला होता है। जो शिष्य या श्रावक अपने गुरु को अप्रसन्न करता है तो वह अबौधि को प्राप्त करता है। इसलिए शिष्य को अपने गुरु या अपने से बड़े संत की आशातना, अवहेलना से बचने का प्रयास करना चाहिए।

युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘जन्म मरण का खेल है हमारा तुम्हारा’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।

इस अवसर पर श्रीमती मनिषा संचेती ने तेले तप का प्रत्याख्यान लिया। प्रत्यक्ष एवं ऑनलाईन के माध्यम से अपनी धारणाओं के अनुसार तपस्वियों ने उपवास, एकासन, आयंबिल आदि तपस्याओं का प्रत्याख्यान लिया।

आज की धर्म सभा में चेम्बुर, मुंबई, आणंद आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।

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