

आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य प्रमाद के कारण अपने संसार को लम्बा करता है। मनुष्य का छोटा सा जीवन जो 100 वर्ष भी पूर्ण नहीं कर पाता, इस छोटे से जीवन काल में जो व्यक्ति जड़ जीव का भेद जान लेता है, शरीर में विद्यमान आत्म तत्व को जान लेता है, वह जीवन को सफल बना लेता है। जीवन के इस सत्य को जानना जरूरी है, सभी जीवों में अपने समान आत्मा को देखना चाहिए न कि शरीर को, क्योंकि शरीर तो कभी न कभी नष्ट होने वाला है।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति धन, वैभव, संपदा, गाड़ी, बंगला इत्यादि को सुख मानता है लेकिन वह वास्तविक सुख नहीं है वह केवल शरीर की साता के लिए हो सकता है किंतु वास्तविक सुख तो इस देह के भीतर आत्म तत्व में ही है। व्यक्ति के द्वारा किये हुए कर्म ही कार्मण शरीर के रूप में साथ जाने वाले होते हैं, इसलिए इस मनुष्य रूपी देह का उपयोग अच्छे कर्म एवं आत्मा में स्थित रहने के लिए करें।
उन्होंने आत्मा के आठ गुणों की चर्चा करते हुए फरमाया कि जो व्यक्ति अपने को जानकर संसार को ठुकरा देता है, मिथ्यात्व को तोड़ देता है, परिवार के मोह से दूर रहता है, भगवान की वाणी पर श्रद्धा कर स्वयं को तपाता हुआ संयम मार्ग पर अग्रसर होता है वह मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ जाता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो पुरुष अपने सिर से पर्वत को फोड़ने की चेष्टा करता है, सोये हुए शेर को जगाता है, शक्ति की धारा पर हाथ-पैर मारने की चेष्टा करता है इस प्रकार की चेष्टा करने वाला मूर्ख होता है, परन्तु माता-पिता एवं गुरु की अवहेलना करने वाला मूर्ख शिरोमणी है जो वर्तमान लोक और परलोक में भी दुःखी होता है।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘सिद्ध अरिहंत में मन रमाते चलो सारे कर्मों के बंधन हटाते चलो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर सचिन से लक्ष प्रवीणजी सामरा ने आज 9 उपवास का प्रत्याख्यान लिया, तपस्वी का शॉल, माला व मोमेन्टो द्वारा सम्मान किया गया
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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