आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति चाहे कितना ही दान, शील, तप कर ले, किंतु जब तक उसे अपने अस्तित्व का बोध नहीं है कि मैं कौन हूं? कहां से आया हूं? तब तक वह चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में भ्रमण करता रहेगा। सिद्धों, देवी-देवताओं, मनुष्य, सभी जीवों में आत्म भाव रखने वाला आत्मार्थी होता है। जिस तरह मनुष्य में जीव होता है उसी तरह प्राणी मात्र में जीव की उपस्थिति रहती है, चाहे वह जीव पशु-पक्षी, एकेन्द्रिय, बेइन्द्रिय, पंचेन्द्रिय, पृथ्वीकाय, जलकाय, वायुकाय के जीव हैं। जब व्यक्ति वृक्ष के पत्ते को तोड़ देता है, किंतु उसे पुनः जोड़ नहीं सकता। इसी प्रकार किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्राणी की हिंसा करने का अधिकार नहीं है।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति में मद नशे की तरह होता है। आठ प्रकार के मद होते हैं जाति मद, कुल मद, बल मद, रूप मद, तप मद, श्रुत मद, लाभ मद, ऐश्वर्य मद ये आठों ही मद सम्यक्त्व को दूषित करने वाले होते हैं।
उन्होंने यह भी फरमाया कि कई व्यक्तियों में तपस्या का भी मद होता है कि मैंने इतनी अठाई, मासखमण तप कर लिये इस तरह से अपने तप का ज्यादा प्रचार नहीं करना चाहिए, तप को जितना गुप्त रखते हैं उतना ही अधिक फलीभुत व कर्म निर्जरा में सहायक होता है।
उन्होंने श्रद्धाुलओं को ध्यान की प्रेरणा प्रदान करते हुए फरमाया कि पारस चैनल के माध्यम से प्रतिदिन सुबह 5 बजे से ध्यान का प्रसारण होता है जिसका लाभ लेकर अपने जीव में स्थित रहने की कला सीख सकते हैं जिससे आत्म कल्याण की ओर आगे बढ़ सकते हैं।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीश मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि गुरु की आशातना करने वाले शिष्य के गुण अग्नि की तरह भस्मिभूत हो जाते हैं, आचार्य अथवा गुरु की आशातना करने वाले को मोक्ष से भी वंचित रहना पड़ता है, इसलिए गुरु की किसी भी तरह की आशातना से बचना चाहिए।
उन्होंने आगे फरमाया कि मिथ्यात्वी व्यक्ति निमित्त को दोष देकर दुःखी होता है वह निमित्त को दोषी मानता है, जबकि सम्यक्त्वी व्यक्ति कर्मों का दोष मानकर समभाव से जो भी कष्ट आता है उसे समता से स्वीकार करता है और कर्मों को निर्जरित करता है।
इससे पूर्व युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘जन्म-जन्म के क्लेश मिटाएं वीतराग विज्ञान करें आराधना हम’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर तपस्वियों ने अपनी धारणा अनुसार उपवास, एकासन आदि का प्रत्याख्यान लिया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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