
आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यक्ति का जीवन डोर की तरह होता है यह जीवन की डोर कब टूट जाए कोई पता नहीं। यह जो मनुष्य जन्म मिला है तो इसमें प्रमाद मत करो। प्रमाद यानि व्यक्ति में कर्त्ता-भोक्ता का भाव होना कि अमुक काम मैंने किया, जिसमें यह मेरेपन का भाव होता है वह प्रमाद है। प्रमादी व्यक्ति अपने स्वभाव को नहीं जानता, विभाव में आकर प्रमाद करता है इसलिए जीवन में प्रमाद नहीं करना चाहिए।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति का जीवन सूरज की तरह होता है सुबह-दोपहर-सायं और रात्रि। व्यक्ति का बचपन सुबह के सूरज की भांति सुहाना लगता है, दोपहर को तेज धूप यानी जवानी में व्यक्ति में जोश रहता है वह कुछ पाप कर्मों का बंध भी कर लेता है। सायं को सूरज ढलता है वैसे ही जवानी ढलती है बुढापा आता है, बुढ़ापे में शरीर साथ नहीं देता है और फिर रात्रि की भांति शरीर खत्म हो जाता है, इसलिए जब तक बुढ़ापा, आधि-व्याधि नहीं आ जाए तब तक धर्म कर लेना चाहिए।
उन्होंने आगे फरमाया कि जो व्यक्ति परिवार, बंगला, वैभव संपदा को अपना मानता है लेकिन जब जीव चला जाता है तो उसका मालिक कोई और ही बन जाता है। व्यक्ति मूल अपनी आत्मा को जाने। जीव को पद-प्रतिष्ठा, वैभव कुछ नहीं चाहिए। वह निर्लेप रहे। व्यक्ति अपने जीवन का आत्मनिरीक्षण करे कि उसका जीवन सुलझा हुआ है या उलझा हुआ है, कहीं धन, पद-प्रतिष्ठा में उलझा हुआ तो नहीं है। आत्मार्थी व्यक्ति ही अपने जीवन की वर्तमान व आगे की गति को अच्छा बन सकता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जो शिष्य गुरु की अवहेलना करता है वह मिथ्यात्व के कारण आशातना कर लेता है। वह छोटी सी गलती से मिथ्यात्व में चला जाता है, वह गुरुजनों को अल्पज्ञ मानता है। यदि गुरु की अधिक उम्र के कारण उनकी बुद्धि कमजोर हो गई है तो गुरु की निंदा नहीं करनी चाहिए।
उन्होंने यह भी फरमाया कि अनेक सम्प्रदाय के संत दूसरे सम्प्रदाय के संतों की कमियां देखकर उजागर करते हैं किंतु उनके भीतर आत्मा को नहीं देखते हैं तो वह अधोगति के भागी बनते हैं, इसलिए निंदा से बचने का प्रयास करना चाहिए।
युवामनिषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘न पापों में जीवन गुजारा करो तुम, प्रभु नाम पल-पल उच्चारा करो तुम’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में मुंबई, दिल्ली, हुबली, बैंगलोर, दावनगिरी आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुओं ने गुरु दर्शनार्थ उपस्थित होकर प्रवचन का लाभ लिया। साथ ही कई श्रावकों ने अपनी धारणा के अनुसार त्याग-प्रत्याख्यान ग्रहण किये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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