अरिहंत परमात्मा की आज्ञा है सर्वोपरि |

28 JULY 2025

‘‘भगवान महावीर की साधना के सूत्र श्री आचारांग सूत्र में वर्णित है जिसमें प्रथम सूत्र है – लोक की आज्ञा है तीर्थंकर भगवान के वचनों को, अपकाया के लोक के स्वरूप को जानकर, संयम की परिपालना करें, षरीर का पिण्ड तीनों लोक के समान है। इस शरीर रूपी लोक में जीव अजीव को जानकर सोह्म का स्वरूप जानकर साधना करें आज्ञा ही धर्म है आज्ञा ही तप है। जो आज्ञा अरिहंत परमात्मा देते हैं वह सर्वोपरि है’’ उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये।

उन्होंने श्री तत्वार्थ सूत्र की चर्चा करते हुए फरमाया कि जैन धर्म के सभी सम्प्रदाय तत्वार्थ सूत्र को मानते हैं। जिसमें आचार्य उमास्वाति का सूत्र है – सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् आचरण। श्री उत्तराध्ययन सूत्र जो भगवान महावीर की अंतिम वाणी की देशना है जो मोक्ष मार्ग का सूत्र है जिसमें जीव अजीव के भेद के बारे में बताया गया है। आचार्य भगवन आत्माराम जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र को सिद्ध किया उन्होंने सब शास्त्रों का सार निकालकर सूत्र दिया जो उनका गहन अध्ययन था।
उन्होंने आगे अभय दान की चर्चा करते हुए फरमाया कि जो स्वयं अभय में जीता है, किसी भी प्राणी को भय नहीं देता उसे अभयदान कहते जो दान में श्रेष्ठ दान है। कोई जीव मरना नहीं चाहता सभी जीव जीना चाहते हैं इसलिए अभय कर दो, जैन साधु पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजकाय, वायुकाय, वनस्पितिकाय और त्रसकाय इन छह काय के जीवों की हिंसा से बचते हैं।

उन्होंने यह भी फरमाया कि जो ज्ञान का निषेध करता है वह अंतिम आंशिक रूप से आत्मा का निषेध कर देता है इसलिए भगवान ‘सोह्म’ की बात कही है। सोह्म का सूत्र है सभी जीवों में समान आत्मा है। सोहम की साधना के द्वारा प्राणी मात्र के प्रति मंगल की कामना करनी चाहिए।

प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. श्री दशवैकालिक सूत्र की आठवीं गाथाओं के सूत्रों का विवेचन करते हुए फरमाया कि साधु के केवल साधुओं के साथ ही परिचय करना चाहिए। साध्वियों का साध्वियों के साथ परिचय करें यह ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक है। साथ ही उन्होंने गरिष्ठ भोजन को रोग का कारण बताया।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘अपने अंतर में उतर कर देख लो, निज के दर्पण में नजर भर देख लो’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति दी

- आचार्य शिवमुनि

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