

आचार्य भगवन उद्बोधन नहीं देकर आज की सभा को आत्म ध्यान के प्रयोग से लाभान्तिव किया। भगवन ने आत्म ध्यान के प्रयोग में जड़ और जीव दोनों का भेद करवाते हुए फरमाया कि भीतर आत्मा में अनंत सुख है उसका अनुभव करें, उपस्थित श्रद्धालुओं ने ध्यान का प्रयोग कर जड़ जीव के भेद को जानकर आत्म सुख का अनुभव किया।
इससे पूर्व प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि व्यवहार में शील का पालन होता है और निश्चय में आत्मा है। यह शरीर साधक भी है और बाधक भी है। यदि अपने लक्ष्य तक पहुंचाए तो साधक है और लक्ष्य से भटकाए यदि मन पर नियंत्रण नहीं है तो वह बाधक बन जाता है। जिस व्यक्ति का अपने मन पर नियंत्रण है और पांचों इन्द्रियों का संयम करता है तो वह ब्रह्मचर्य पालन कर सकता है। विचारवान साधु पुद्गलों के परिणाम को जानता है। शब्द, वर्ण, रस, गंध, स्पर्श ये सारे विष के समान है ये सारे प्रतिपल अनित्य हैं बदल रहे हैं। चाहे तीर्थंकर हो या आचार्य उनके उसके शरीर का परिवर्तन होगा उसे कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि पुद्गल का धर्म है परिवर्तनशील है। आत्मा का धर्म है देखो जानो, आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं आ सकता।
उन्होंने आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के प्रति अपने उद्गार व्यक्त करते हुए फरमाया कि आचार्य भगवन श्रमण संघ को सही दिशा दे रहे हैं, आचार्य भगवन् आज से तीस वर्ष पहले ही क्रियाकाण्ड को गौण किया और आत्म ध्यान को महत्त्व दिया। जिनशासन ध्यान से ही पूरे विश्व में फैल रहा हैं। यदि कहीं ध्यान की चर्चा होती है तो उसमें सबसे पहले आचार्य भगवन का नाम प्रमुखता से आता है। ध्यान ऐसी साधना है जो आत्मा को आत्मा में रमण कराती है। जिसमें पूर्णतः सीमंधर स्वामी भगवान की वाणी मिलती है। अंतर है तो भाषा है। मूल मार्ग आत्मा और शरीर है।
युवा मनीषी श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘जीवन एक वृक्ष है पानी पत्ते बचपन शाख जवानी, फिर है पतझड़ खुश्क बुढापा इसके बाद खत्म कहानी’’ सुमधुर भजन की प्रस्तुति देते हुए फरमाया कि जीवन क्षण भंगुर है यह सभी जानते है। श्वांसे कभी भी पूर्ण हो सकती है। संग्रह होता है तो क्षय होता है, संयोग है तो वियोग भी होता है इन सारी परिस्थितियों में एक समान रहती है वह है आत्मा, जो सत्य है, सनातन है, नित्य है उसको जीवन में उतारें और अपने जीवन में वैराग्य को जन्म देकर जीवन को सफल बनाएं।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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