
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आज के उद्बोधन में मेघकुमार के प्रसंग का उल्लेख करते हुए फरमाया कि मेघकुमार की दीक्षा हो गई थी। मेघकुमार रात्रि में सो रहे थे उस समय किसी साधु की ठोकर लगी तो वह जाग गये और मन में विचार आया कि मैं राजकुमार था तब सब मुझे आदर से बुलाते थे और साधु बनने के बाद मुझे किसी ने अंधेरे में ठोकर मार दी। सुबह उठते ही भगवान महावीर के पास जाते हैं, भगवान महावीर तो केवलज्ञानी थे उन्होंने पहले ही कह दिया कि तुम पिछले जन्म में हाथी थे, पिछले भव में एक जंगल में आग लगी जो दो-तीन दिन तक जलती रही उस समय एक खरगोश तुम्हारे पांव के नीचे शरण लेता है, जिस समय तुम हाथी की देह में पांव को खुजलाने के लिए पैर ऊपर किया तो पैर के नीचे खरगोश आकर बैठ गया, फिर हाथी की मृत्यु हो जाती है और उस खरगोश की जान बचाने पर इस भव में राजकुमार के रूप में जन्म हुआ है।
इसी प्रकार जब कोई मुनि संयम जीवन ग्रहण करने के बाद डांवाडोल हो जाए तो उन्हें प्रेम से समझाना चाहिए। साधु को संयम की परिपालना करनी चाहिए। भगवान ने फरमाया है कि जिस श्रद्धा, वैराग्य भाव के लक्ष्य के साथ दीक्षा ग्रहण की है, उसी श्रद्धा वैराग्य को बढ़ाना है। कहीं भी लक्ष्य के बीच में किसी प्रकार की शंका न आए। श्रद्धा परिपक्व हो जाए तो फिर मन विचलित नहीं होता। दृढ़ता व श्रद्धा के साथ नियम का पालन करने वाला बड़ा होता है। श्रद्धा तब आती है जब सत्य को जानने की रूचि होती है। सत्य है तत्व को जानने की रूचि, भीतर से एक प्यास उत्पन्न हो।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति का मन चालबाज है, बुद्धि और मन दोनों चंचल है मन हमेशा नीचे की ओर ले जाता है इसलिए मन में श्रद्धा परिपक्व होनी चाहिए, जहां संदेह है वहां मन डोल जाता है। कोई भी कार्य करना है तो संदेह नहीं करना चाहिए। अटल श्रद्धा होनी चाहिए किसी भी कार्य के प्रति, जिनवाणी के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में श्री दशवैकालिक सूत्र की वांचना में फरमाया कि जो व्यक्ति आत्मा को गौण करता है और शरीर के प्रति जागरूक है वह प्रमादी है।
युवा मनिषी मधुर गायक श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘सिद्ध शिला है मेरा धाम, शुद्ध-बुद्ध है आत्मा राम’’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।
विशेष – श्रमण संघीय द्वितीय पट्टधर आचार्य सम्राट आनन्दऋषि जी म.सा. की 126वीं जन्म जयन्ती 25 जुलाई 2025 को सम्पूर्ण देश में सामूहिक तेला तप की आराधना से मनाई जाएगी।
ऑनलाईन के द्वारा मुंबई से नमन हितेश मेहता ने 15 उपवास, साथ ही अन्य श्रावकों ने अपनी धारणा अनुसार त्याग प्रत्याख्यान लिये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
