
आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आज के उद्बोधन में फरमाया कि जिस तरह से दो व्यक्तियों में किसी एक ने भोजन कर लिया और दूसरे ने नहीं किया, जिसने भोजन किया उसकी भूख मिट जाती है इसी तरह आत्मा के बारे में खूब कहा, सुना, पढ़ा, स्वाध्याय किया, चर्चा की पर आत्मा में गहरे नहीं उतरे तो लाभ नहीं मिलता। जीव का जीव में ठहरने से गहराई आती है। जिस तरह से म्यान में तलवार रहती है, दोनों अलग है उसी तरह यह आत्मा और शरीर है जो दोनों साथ रहते हैं किंतु दोनों भिन्न-भिन्न है।
उन्होंने आगे द्रव्य ग्रंथि और भाव ग्रंथि की चर्चा करते हुए फरमाया कि हिंसा एक ग्रंथि है जो आत्मा को कषायों के द्वारा बांधती है। द्रव्य ग्रंथि मंे दस प्रकार के परिग्रह बताये गये हैं और चौदह प्रकार का भाव हैं जिसमें पहला मिथ्यात्व है। द्रव्य हिंसा करने से भाव हिंसा उत्पन्न होती है जो मोह कर्म का बंध है। मोह वह है जो व्यक्ति को बेहोश कर देता है जिस प्रकार शराबी व्यक्ति को भान नहीं रहता। वैसे ही मोह बुद्धि को मूढ़ कर देता है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जिस व्यक्ति या संत में मनोगुप्ति की साधना नहीं होती है तो वे भ्रमित हो जाते हैं, मन को वश में करने के लिए मनोगुप्ति की साधना है और मनोगुप्ति की साधना के लिए आत्म ध्यान शिविरों का आयोजन होता है। जिससे साधक मन, बुद्धि, इन्द्रियों के पार जीव के द्वारा जीव में ठहरने का पुरुषार्थ करते हैं, जिससे अनंत सुख अनुभव मिलता है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि नवदीक्षित साधु को अपने गुरु के इंगित को समझना चाहिए ऐसा करने वाला निश्चित रूप से अपने जीवन को आगे बढ़ाता है। नवदीक्षित साधु को अपने से ज्ञान में बड़े सम्पन्न साधु एवं आचार्य के प्रति विनय भक्ति करनी चाहिए। जो गुरु के सम्मुख रहता है, गुरु के इंगित को समझता है वह विकास करता है।
युवा मनिषी मधुर गायक श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘मानव का यह जीवन तू सफल बना लेना’’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।
इस अवसर पर राजपुरा से आए स्व. रमेशचन्द जी जैन की धर्मपत्नी श्रीमती क्षमारानी जैन एवं श्री राहुल जैन का शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से शॉल माला द्वारा सम्मान किया।
ऑनलाईन के माध्यम से पार्श्व सेठिया ने 5 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। चलथान से श्रीमती मनीषा संचेती ने 4 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान लिया, साथ ही अन्य श्रावकों ने अपनी धारणा अनुसार त्याग प्रत्याख्यान लिये।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
WhatsApp us
