


आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने आज के उद्बोधन में फरमाया कि एक चिकित्सक का लक्ष्य होता है कि मैं रोगी व्यक्ति का उपचार कर उसका रोग ठीक करूं, एक व्यापारी का लक्ष्य होता है कि मैं अच्छा लाभ कमाऊं और एक विद्यार्थी का लक्ष्य होता है कि मैं परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करूं, इसी प्रकार एक गृहणी का लक्ष्य होता है कि वह परिवार की सेवा करे, घर में कोई साधु या मेहमान आए तो अच्छा भोजन बनाकर दूं। इस प्रकार एक गृहणी भी रसोई के द्वारा भोजन करवाकर पुण्य लाभ प्राप्त कर सकती हैं।
उन्होंने आगे फरमाया कि व्यक्ति जब वाहन से सड़क मार्ग से कहीं यात्रा पर जाते हैं और जब कोई उसे साधु चलता हुआ दिखाई दे तो रूक कर साधु को प्रासुक जल, आहार देते हैं तो बहुत बड़े पुण्य के भागीदार बन सकते हैं और अपने कर्मों को निर्जरित कर सकते हैं।
आचार्य भगवन ने फरमाया कि जैसे सुबह का सूरज मनमोहक लगता है वैसे ही बचपन अच्छा लगता है बच्चे सबको अच्छे लगते हैं, दोपहर सूरज की धूप आ जाती है तो सूरज को देख नहीं सकते वही सूरज शाम को ढल जाता है। ऐस ही बचपन, जवानी और बुढ़ापा शरीर की स्थिति है। इस शरीर का कभी अभिमान नहीं करना चाहिए। भगवान की वाणी कहती है कि जब तक बुढ़ापा नहीं आता, इन्द्रियां शिथिल नहीं होती, शरीर में आधि-व्याधि नहीं होती तब तक धर्म करना चाहिए। धर्म का मतलब आकार में निराकार आत्मा में आओ, जीव को जीव में स्थित करो। संसार के लिए समय निकालते हो तो कम से कम अपने लिए अपनी आत्मा के कल्याण के लिए समय निकालो वही असली कमाई है।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि अपनी आत्मा पर श्रद्धा हो श्रद्धा के बाद इस बाह्य शरीर को अंतर तप से तपाना है। बाह्य और आभ्यंतर तप का धारक साधक मन और पांचों इन्द्रियों पर संयम करता है। ये पांचों इन्द्रियां और छठा मन अगर इनको खुला छोड़ दिया तो चार गति में भटकाएंगे। इनको नियंत्रित करना है और वह स्वाध्याय व ध्यान के द्वारा ही संभव है।
युवा मनिषी मधुर गायक श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘पायो जी मैंने आत्म दर्शन पायो’’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।
त्रिकमनगर से श्रीमती रतनबेन मांगीलाल माण्डोत ने 14 दिन, श्री कान्तीलाल भोगर 12 दिन, सचिन से श्रीमती स्वीटी संजय कुमार गन्ना ने 9 दिन की तपस्या का प्रत्याख्यान किया। ऑनलाईन के माध्यम से मुंबई के 16 वर्षीय नमन हितेश मेहता ने 11 उपवास का प्रत्याख्यान लिया। आज की धर्म सभा में राजपुरा, लुधियाना आदि क्षेत्रों से श्रद्धालुगण उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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