
‘‘व्यक्ति अपने अस्तित्व के बोध के बिना यह नहीं जान सकता कि वह छह दिशाओं में कहां से आया है, मनुष्य अपनी काया के लिए, धन प्राप्त करने के लिए पूरा जीवन लगा देता है। उसे एक प्यास जागृत होनी आवश्यक है कि वह इस संसार में क्यों आया है, अपने अस्तित्व का बोध होना जरूरी है, अस्तित्व के बोध के बिना वह अपना आत्म कल्याण नहीं कर सकता’’ उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक उद्बोधन में फरमाया।
नाशिक एवं कुप्पकला ध्यान केन्द्र में चल रहे ऑनलाईन ध्यान शिविर के सातवें दिन शिविरार्थियों को सम्बोधित करते हुए आचार्य भगवन ने फरमाया कि आश्रव कर्म आने का रास्ता है और संवर कर्मों को रोकने का रास्ता है आत्म ध्यान शिविर कर्मों को निर्जरीत करने की साधना है। वे भाग्यशाली है जो ध्यान साधना कर रहे हैं। जीव के पास आठ गुणों की संपदा है, जीव में अनंत शक्ति है जिस प्रकार सूर्य की किरणों के आगे बादल आने से सूर्य की किरणें दिखाई नहीं देती उसी प्रकार आत्मा के उपर कर्म रूपी बादल आ आने से आत्मा के गुण प्रकट नहीं हो पाते।
उन्होंने आगे फरमाया कि जहां-जहां स्थानक है वहां प्रतिदिन एक घंटा ध्यान का क्रम चलना चाहिए, ध्यान में कुछ भी मन, काया, से बुद्धि से कोई भी क्रिया करने की आवश्यकता नहीं है, भगवान की वाणी जो अनादिकाल के मिथ्यात्व को तोड़ती है उसका ध्यान करना है, जिससे अनादिकाल के मिथ्यात्व को तोड़कर साधक अपने जीव का कल्याण कर सकते हैं।
प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने फरमाया कि मनुष्य अनादिकाल से पुद्गल शरीर और शरीर से जुड़े संसार का चिंतन करता है जो मिथ्यात्व है। पुद्गल का स्वभाव परिवर्तनशील है, शरीर को चलाने के लिए जब पुद्गल की आवश्यकता होती है तो पुद्गल लेते हैं, किंतु जीव तो अपने स्वभाव में है उसे किसी प्रकार के पुद्गल की आवश्यकता नहीं है।
प्रमुख मंत्री श्री ने आगे फरमाया कि मनुष्य प्रतिदिन की अपनी दिनचर्या का अवलोकन करे कि चौबीस घंटों में ज्यादा किसका चिंतन चल रहा है यदि अपने स्वभाव में रहते हैं तो कर्मों की निर्जरीत कर रहे हैं, विभाव में हैं तो कर्मों का बंधन कर रहे हैं। स्वभाव व्यक्ति का धर्म है किंतु बार-बार विभाव में जाने की वृत्ति बन गई है उस वृत्ति को रोकने का प्रयास कर स्वभाव में रहने का प्रयत्न करें।
सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने ‘‘ मोक्षपुरी अपना घर है चलो वहीं सब जाएं ’’ समधुर भजन की प्रस्तुति दी।
सचिन से श्रीमती संजु रविप्रकाश पिछोलिया ने 9 दिन के उपवास का प्रत्याख्यान लिया। शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन की ओर से तपस्वी का शॉल, माला द्वारा सम्मान किया गया।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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