धर्म आत्मा के कल्याण के लिए होता है |

14 NOVEMBER 2024

‘‘एक व्यक्ति अति शीघ्र समझ जाता है। एक व्यक्ति बड़ी देर से समझता है। एक व्यक्ति समझता ही नहीं। जीवन व्यतीत हो जाता है, वह नहीं समझता। शास्त्र ने कहा कि सरल, भावुक और विशाल हृदय के लोग सम्प्रदायों के घेरों को तोड़ देते हैं और धर्म के विशाल साम्राज्य में चले जाते हैं, ऐसे लोग सम्यक् सिद्धान्तों को समझकर उन्हें ग्रहण भी करते हैं। लोग उन्हें कहने लगते हैं कि उन्होंने धर्म छोड़ दिया। ये धर्म से भ्रष्ट हो गए, किन्तु वह धर्म को छोड़ना नहीं है। वह धर्म को ग्रहण करना है। जो आस्था प्राचीन तो है, पर गलत है, उससे चिपके रहने में कोई लाभ नहीं है। वह तो केवल जीवन गुज़ारना है। अपना लोक परलोक बिगाड़ना है। ’’ उपरोक्त विचार आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाये।

उन्होंने फरमाया कि धर्म आत्मा का कल्याण करने के लिए होता है। व्यक्ति को जब तक उसके गलत होने का पता नहीं चलता, तब तक वह उससे सम्बद्ध रहता है। उसे ही सही मानता रहता है, किन्तु जब कोई सम्यक् बोध देने वाला महापुरुष जीवन में आ जाए, आत्मा उसे स्वीकार करे और वह तुलनात्मक अध्ययन करे, यह देखे कि आज तक मैं जिस मार्ग पर चला आ रहा था, वह सत्य नहीं है और आज जो मार्ग मुझे मिल रहा है, वह सत्य है तो उसे कुमार्ग-त्याग में संकोच नहीं करना चाहिए।

उन्होंने फरमाया कि जिसकी आत्मा जागृत है, वह सत्य को प्राप्त कर लेता है। सत्य में आत्मा प्रमाण है किन्तु शर्त यह है कि उस पर राग-द्वेष, साम्प्रदायिक व्यामोह, आसक्ति का आवरण नहीं होना चाहिए। यदि ये आवरण हटे हुए हैं तो वह सत्य को अवश्य देख लेगा।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में तत्वार्थ सूत्र की वांचना करते हुए शुक्ल ध्यान के बारे में फरमाया।

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘वीर नाम के हीरे मोती, प्रभु नाम के हीरे मोती मैं बिखराऊं गली-गली, ले लो रे कोई वीर का प्यारा शोर मचाऊं गली-गली’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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