आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक उद्बोधन में फरमाया कि जब साधक को आत्मा पर अटल विश्वास हो जाता है तो उसे उपसर्ग से घबराना नहीं चाहिए। कामदेव, कुण्डकौलिक, चुलनीपिता, सुरादेव आदि के जीवन वृत्तों में देखा है कि देव भी उनकी श्रद्धा को डिगा नहीं सके। उनके समक्ष इतने वीभत्स दृश्य उपस्थित किए गए, किन्तु वे भयभीत नहीं हुए। यदि कहीं कोई जरा सा विचलित भी हुआ, उसने प्रायश्चित्त कर लिया। इसी प्रकार साधक को साधना के समय कष्टों से घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि आत्मा अष्टगुणों से सम्पन्न है, इस निराकार आत्मा को कोई नष्ट नहीं कर सकता, कोई उसे काट नहीं सकता।
उन्होंने फरमाया कि अनादिकाल से जीव को अपना नहीं माना। विश्राम करते हुए, चलते समय, संयोग-वियोग में मेरा शरीर, बुद्धि, मन, इन्द्रियांें को माना ये सब बंधन है। अपने अस्तित्व को स्वीकार करना है। जीव तत्व वह सत्य है। जीव अस्तित्व को मानकर उसमें भीतर चले जाना। जीव में ठहरते रहोगे तो आगे बढ़ते जाओगे। स्थिरता ही ध्यान है, जैसे-जैसे साधना होती है वैसे-वैसे व्यक्ति का अनुभव अपने आप बढ़ता जाएगा। पुद्गल है जो बदलता रहता है। जिस योनि में गए मनुष्य देव, पशु-पक्षी सब बदलता रहता है। अपना अस्तित्व है अपने अस्तित्व को जानो कि आप जीवात्मा हो, कहीं भी जाओ जीव साथ रहेगा। चाहे सिद्धशिला, मोक्ष चले जाओ जीव तो रहेगा। मोह, मिथ्यात्व को तोड़कर आत्मा को महत्त्व देना है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि भारतीय परंपरा में 72 कलाएं पुरुषों की है और 64 कलाएं स्त्री की है, जिसमें गर्भ धारण की कला का भी उल्लेख मिलता है। सति मदालसा ने अपने सातों पुत्रों को गर्भ में संस्कार दिए कि तुम शुद्ध हो, बुद्ध हो, निरंजन हो, संसारी माया को छोड़ो और सातों पुत्रों को सन्यासी बना दिया।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि राग संसार का कारण है और वैराग्य मुक्ति का कारण है। साधक अपनी आत्म साधना के लिए एकत्व भावना का चिंतन करे कि जीव अकेला है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ‘‘बंदे छड़ दे धंधे, चले निष्फल सांस तुम्हारी दिन तो कटे है धन की धुन में, नींद में रात गुजारे’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में मुंबई, पूना, चिंचवड़, धुलिया, सूरत आदि जगहों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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