आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान महावीर के लाखों श्रावक थे। ये श्रावक साधना की दृष्टि से उत्कृष्ट व महान थे। इनके जीवन में कुछ विशेष गुण भी थे। सबसे बड़ी बात वे अपनी साधना में सुदृढ़ थे। मनुष्य तो क्या, देवता भी उन्हें साधना से विचलित नहीं कर सके। साधना के इस वैशिष्ट्य के कारण शास्त्रकारों ने उदाहरण के रूप में उनका जीवन वृत्त संसार के समक्ष प्रस्तुत किया है ताकि लोग इनकी साधना और दृढ़ता से प्रेरणा ले सकें।
उन्होंने फरमाया कि धन के महत्त्व को समझा जाता है जो सदा काम आने वाली चीज़ नहीं, जो पाप का कारण भी है, किन्तु इसे अज्ञानी प्राणी महत्त्व प्रदान करता है। धनार्जन के लिए कितना समय निकल जाता है। दिन-रात दौड़-धूप हो रही है। प्रवास में जाया जाता है। महीनों अपने बाल-बच्चों से दूर रहा जाता है। अभी तक धर्म, सत्संग, ज्ञान मानव की दृष्टि में महत्त्वपूर्ण नहीं बना। जिस दिन उसने समझ लिया कि यह भी महत्त्वपूर्ण है, अपितु धन से अधिक धर्म महत्त्वपूर्ण है, तब इसके लिए भी समय निकल आएगा।
उन्होंने उपासकदशांग सूत्र में वर्णित कुण्डकौलिक श्रावक के बारे में बताया कि कुण्डकौलिक भगवान महावीर के श्रीचरणों में बैठा, उसने ज्ञान प्राप्त किया। ज्ञान का प्रभाव यह हुआ कि संसार को त्याग दिया। एक उच्चकोटि का श्रमणोपासक बन गया। वह स्वसमय-परसमय का ज्ञाता बन गया। उसका ज्ञान केवल मनोरंजन या अभिमान के पोषण के लिए नहीं था। मैं यह जानता हूं, वह जानता हूं, मैंने यह थोकड़ा याद किया है, मैंने इतने सूत्र पढ़े हैं, मैं स्तोत्र, प्रतिक्रमण सब जानता हूं, उस कुण्डकौलिक का ज्ञान इस प्रकार अभिमान का पोषण करने के लिए नहीं था, अपितु उसका ज्ञान आचरण के लिए था। वह ज्ञान को आचरण में ढालने का प्रयत्न करता था। उसका ज्ञान दृढ़ भी था।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि तप से संवर और कर्म निर्जरा दोनों होते हैं। जब आप जीव को जीव में स्थित करते हैं अर्थात् जीव स्वभाव में स्थित होता है तो तीन कार्य एक साथ होते हैं जिसमें नया बंधन रूकता है। बंध जो उदय में आते हैं वह क्षय की धारा पकड़ते हैं और भीतर आत्मा के अंनत गुण अनुभव में आते हैं।
इससे पूर्व मधुर गायक निशांत मुनि जी म.सा. ने ‘‘प्रभु नाम सिमर सुख पाएगा, मत भूल मनुष्य पछताएगा’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में उदयपुर, भीलवाड़ा, चैन्नई, बैंगलोर आदि जगहों से श्रद्धालु गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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