आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मनुष्य का जीवन चार गति चौरासी लाख जीवायोनि में उत्कृष्ट है क्योंकि देवलोक में जितना व्यक्ति का पुण्य कर्म है उतने दिन स्वर्गलोक में रह सकते हैं जब पुण्य कर्म पूर्ण हो जाता है वापिस आना पड़ता है। वहां साधना नहीं कर सकते और न ही कर्मों को निर्जित कर सकते है, मनुष्य जन्म में ही व्यक्ति अपने कर्मों को निर्जित कर सकता है इसलिए मनुष्य जन्म को सर्वश्रेष्ठ बताया है।
उन्होंने यह भी फरमाया कि जीवन में यदि कोई बुराई आ जाए तो उसकी आलोचना करनी चाहिए जो आत्म ध्यान शिविर में बताई जाती है। भोजन बनाते समय, यात्रा करते समय, कोई भी क्रिया करते समय पाप लगता है तो उसकी आलोचना करनी चाहिए। व्यक्ति यह विचार करे कि मैंने सुबह से शाम तक क्या किया यदि उसकी अंतःकरण आलोचना प्रतिक्रमण करता है तो वह पाप कर्मों के बंधन से बच सकता है।
उन्होंने भगवान महावीर के दस श्रावकों में चौथे श्रावक सुरादेव की चर्चा करते हुए फरमाया कि देव द्वारा रोगोत्पत्ति का भय दिखाने पर सुरादेव पौषध व्रत से विचलित हो जाता है। देवता ने उपस्थित होकर सुरादेव को कहा-इस साधना को छोड़ दे। नहीं तो मैं इस तलवार से तेरे तीनों पुत्रों को तेरे सामने मौत के घाट उतार दूंगा। ये धमकी भरे शब्द सुनने के बाद भी सुरादेव विचलित नहीं हुआ। वह निर्भीक बना रहा। अडिग रहा। उस देवता ने देखा कि पुत्रों का व्यामोह यह जीत चुका है। अंत में, देवता ने सुरादेव को कहा-सुरादेव। या तो तुम धर्म को छोड़ दो, नहीं तो मैं तुम्हारे शरीर में सोलह रोग उत्पन्न कर दूंगा। जैसे श्वास रोग, खाँसी, जलोदर, बवासीर, कुष्ठ रोग, अक्षिशूल, उदरशूल, कर्णवेदना, अक्षिवेदना, खुजली, भगंदर, मधुमेह, ज्वर (बुखार) आदि। वह पुत्रों का मोह जीत चुका है, किन्तु अपने शरीर का मोह उसने अभी तक नहीं जीता। उस समय अपने शरीर का व्यामोह उसे सताने लगा और वह सोचने लगा कि यदि कहीं इसने मेरे शरीर में रोग उत्पन्न कर दिए, मेरी क्या दशा होगी? पुत्र तो इसने मेरी आंखों के सामने पहले ही समाप्त कर दिए हैं, गृहिणी भी वृद्धा हो चुकी है, कौन मेरी सेवा करेगा? अपने जीवन का व्यामोह उसे सताने लगा और वह विचलित हो गया। उसने सोचा जो मुझे भयभीत कर रहा है, मैं इस पुरुष को पकडूं। वह अपनी साधना, चिंतन, आसन छोड़कर, आंखें खोलकर क्रोध में आकर उठा। उठकर उस पुरुष के पीछे भागा, किन्तु वहां पुरुष कोई नहीं था। यह तो इन्द्रजाल था। यह देवमाया थी। वह उसे डिगाने के लिए आया था। देखा कि आगे कुछ नहीं है। एक लोहे का खम्भा उसके हाथ में आ गया। उसका चीत्कार सुनकर उसकी धन्या स्त्री उसके पास आई। उसने कहा- आप क्यों चिल्ला रहे हैं? उसने सारी आपबीती सुनाई। पत्नी ने कहा-यह तो दैवी माया थी। आप उसमें उलझ गए। वास्तव में आपके पुत्र सुरक्षित हैं। केवल आपको भयभीत किया जा रहा था। आपके शरीर में भी कोई रोग उत्पन्न नहीं हुआ। आप घबरा गए। आपने अपनी साधना भंग कर दी?
उन्होंने आगे फरमाया कि भय और मोह साधना को निर्बल कर देते हैं और उसमें आर्त्तध्यान आ जाता है। अपनी पत्नी के कहने पर उसने अपने कृत्य का प्रायश्चित्त किया और उसकी आलोचना की। फिर पौषधशाला में जाकर वह साधना लीन हो गया। सुरादेव बीस साल तक श्रावक व्रत एवं साढे पांच वर्ष तक ग्यारह प्रतिमाओं का पालन करके प्रथम देवलोक के अरुणकान्त विमान में देव रूप में उत्पन्न होता है। भगवान महावीर ने उसके विषय में कहा कि वह सुरादेव महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर साधना करके सिद्धगति को प्राप्त करेगा।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने संवर निर्जरा के विषय की चर्चा में फरमाया कि आश्रव का निरोध को संवर कहते हैं। इस देह में आत्मा है वह जीव है। जैसे राहगीर को रूकने के लिए कोई पड़ाव मिल जाता है वैसे ही इस जीव को यह देह मिली है। इस अजीव देह के माध्यम से शुभ और
अशुभ आने का जो रास्ता है संसार का कारण बनता हैं, इसलिए इस देह को कर्म निर्जरा में उपयोगी बनाना चाहिए।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘पाया नर तन पाया, क्या पाकर लाभ उठाया’’ भजन की प्रस्तुति दी।
आज की सभा में रायपुर (छत्तीसगढ़), दिल्ली, चैन्नई आदि जगहों से गुरु भक्त दर्शन हेतु उपस्थित हुए।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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