आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में उपासकदशांग सूत्र के वांचन में चुलनीपिता श्रावक के वर्णन में फरमाया कि साधना जब चलती है तो उसमें विघ्न बाधाएं भी आती हैं। व्यक्ति विघ्न बाधाओं से घबराता है। वह घबराहट उसके विचलित होने का कारण बन जाती है। जिस वृक्ष की जड़ें मजबूत हैं, प्रबल वायु भी उसे धराशायी नहीं कर पाती। जो वृक्ष अपनी जड़ों से उखड़ गया है, जरा सी हवा चलती है, वह डगमगाने लगता है। चुलनीपिता साधना में स्थित है। आधी रात्रि के समय उसके सामने भी एक देवता पिशाच के रूप में आकर खड़ा हो गया। वह भयभीत भी करता है और दूसरा कार्य वह यह कर रहा है कि वह उसके मन में मोह उत्पन्न कर रहा है।
उन्होंने आगे फरमाया कि चुलनीपिता श्रावक साधना में स्थित है। देव पिशाच रूप धरकर उसके समक्ष उपस्थित होता है। वह भयभीत भी करता है कि तेरे तीन पुत्र हैं तीनों को तेरे सामने टुकड़ कर दूंगा। तेरी मां को तेरे सामने मार दूंगा। इससे वह चुलनीपिता घबरा जाता है चिल्लाता है, जब चिल्लाता है तो उसकी मां आती है और कहती है तुम ध्यान, कायोत्सर्ग में थे तुम साधना से गिर गये, आलोचना प्रतिक्रमण करो। फिर वह पौषधशाला में चला जाता है और प्रायश्चित करता है। इसी प्रकार साधक के जीवन में कोई कष्ट आए तो उसे मन, वाणी, बुद्धि इन्द्रियोें से जाने-अनजाने में किसी को कष्ट पहुंचाया है तो उसकी आलोचना करनी चाहिए।
उन्होंने आगे फरमाया कि जब वस्तुस्थिति उसके समक्ष आई, उसे अपने कृत्य पर पश्चात्ताप हुआ। वह सोचने लगा-मैं यूं ही विचलित हुआ। मैं केवल मातृमोह में आ गया। यदि मैंने इस मोह को जीता होता तो आज मैं विचलित न होता और यह स्थिति कभी नहीं बनती। माता के कहने से उसने फिर अपने व्रत की आलोचना की। प्रायश्चित्त करके अपने मन को स्थिर किया। ग्यारह प्रतिमाओं का आराधन किया। बीस साल तक वह साधना करता रहा। एक महीने का संथारा आया। निर्दाेष साधना करने के अनन्तर वह प्रथम देवलोक में जाकर देवता के रूप में उत्पन्न हुआ। देवलोक का सुख भोगकर वहां से महाविदेह क्षेत्र में उत्पन्न होकर अपनी आत्मा का कल्याण करेगा और मोक्ष को प्राप्त करेगा।
उन्होंने मोह चिंता, कामचिंता व परचिंता से बचने प्रेरणा देते हुए फरमाया कि आत्मा की चिन्ता सबसे उत्तम चिन्ता है। जो व्यक्ति आत्मा के विषय में सोचते रहते हैं, यह अध्यात्मचिंता है और सर्वश्रेष्ठ है। इसमें कर्मबंधन नहीं। समता और शांति भी है। कर्मबंधन से भी व्यक्ति बचता है। धर्मध्यान में अपने चित्त को लगाता है। यदि चिन्ता ही करनी है तो अपनी आत्मा की चिन्ता करनी चाहिए। यह अध्यात्म चिन्ता सर्वाेत्तम है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने स्थिति बंध का विवेचन करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि जैसे आम पकने के बाद पेड़ से गिर जाते हैं वैसे ही भूतकाल में बांधे हुए कर्म पकने पर कार्मण शरीर को छोड़ देते हैं।
इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘आजा रे आजा द्वार प्रभु के गया वक्त नहीं आता, प्रभु नाम की माला जप ले समय गुजरता जाता’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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