चार दिवसीय मौन साधना सम्पन्न कर शिवाचार्य श्री ने प्रदान किया वीर निर्वाण संवत का मंगल पाठ प्रभु जैसा बनने का संकल्प करें और साधना में पुरुषार्थ करें |

2 NOVEMBER 2024

आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की चार दिवसीय मौन आत्म ध्यान साधना पूर्ण कर आज वीर निर्वाण संवत का मंगल पाठ प्रदान किया जिसका सीधा प्रसारण यूट्यूब चैनल पर किया गया। मंगल पाठ श्रवण करते हेतु सूरत के अलावा नाशिक, इंदौर, उदयपुर, मुंबई, पूना, करनाल, गुड़गांव, दिल्ली आदि अनेक क्षेत्रों से श्रद्धालु उपस्थित हुए।

नव वर्ष के मंगल पाठ के पश्चात् उन्होंने अपने उद्बोधन में फरमाया कि आज का दिन भगवान महावीर का निर्वाण दिवस एवं गौतम स्वामीजी के केवलज्ञान प्राप्ति का दिवस है। वर्तमान में हम सभी भरत क्षेत्र में हैं। प्रभु महावीर ने वह साधना दी है जो उन्होंने साढे बारह वर्ष तक कठोर साधना के बाद प्राप्त की। संगम देव ने एक रात्रि में बीस-बीस उपसर्ग दिये। गौशालक, चण्डकौशिक ने उपसर्ग दिये। भगवान को साधना के लिए कोई स्थान भी नहीं मिला। वे अकेले मौन, निर्ग्रंथ थे, उनका जीवन आकाश की भांति स्वच्छ और निर्मल था। प्राणी मात्र के मंगल और कल्याण के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया। 30 वर्ष तक निरंतर भगवान महावीर पूरे विश्व को मंगल संदेश देते रहे। हम महावीर के शिष्य, भक्त, साधु, श्रावक हैं। हम सभी का कर्त्तव्य है इस जीवन को ऐसे ही नहीं बिताना है। जड़ और जीव का भेद करते हुए अपनी आत्मा के कल्याण के लिए स्व में स्थित होकर अपनी आत्मा का ध्यान करना है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी म.सा. ने भगवान महावीर की अंतिम वाणी 36वें अध्याय की 175वीं गाथा से 269 तक की संपूर्ण गाथा का वांचन में फरमाया कि यदि आगम वाणी का स्वाध्याय करता है तो उसे आगम वाणी समझ में आ जाती है। भेद ज्ञान से उन सूत्रों को जानने लगता है। विशुद्ध संयम के पालन के लिए जीव और अजीव का भेदज्ञान आवश्यक है। मैं जीवात्मा हूं, मेरे अलावा देह से जुड़ा अजीव है, विशुद्धि संयम के बिना समाधि मरण नहीं होता और न ही केवल ज्ञान का दिव्य आलोक जगमगा सकता है।

उन्होंने आगे फरमाया कि परमात्मा ने गौतम के साथ हम सभी को यह प्रेरणा दी कि समय मात्र भी प्रमाद मत करो। परमात्मा कई बार फरमाते हैं कि गौतम जो मेरी प्रति राग है वह छोड़ दे तो तुझे केवलज्ञान, केवलदर्शन हो जाएगा। जिस समय प्रभु महावीर को निर्वाण प्राप्त होता है उस समय उसे पता चला कि परमात्मा निर्वाण हो गए हैं वह मन ही मन सोचता है कि परमात्मा मुझे क्यों छोड़ गए फिर उसके मन में विचार आता है कि वे तो निर्मोही थे, उनमें तो कुछ राग-द्वेष था ही नहीं। मैने ऐसे ही उन्हें राग से बांधा हुआ था, इस तरह से भीतर वैराग की भावना जागती है। चिंतन करते-करते भीतर के भाव गहरे होते चले गये, उन्हीं गहरे भावों में प्रातःकाल के शुभ समय में उनको केवलज्ञान और केवलदर्शन प्रकट हो गया। इस प्रकार गौतम गणधर केवली बन गये। केवल पाट पर नहीं विराजते उस समय में गणधर सुधर्मा स्वामी जो पांचवे गणधर थे वे परमात्मा की गादी पर पहले आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए उसके बाद यह आचार्य परम्परा चली जो वर्तमान में श्रद्धेय आचार्य भगवन 94वें पट्टधर के रूप में शोभायमान हैं।

- आचार्य शिवमुनि

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