आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आज उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि भगवान राम ने अयोध्या में अमावस्या के दिन प्रवेश किया। जबकि अमावस्या को कभी कोई मुहूर्त नहीं होता है। जहां अंधेरा है वहां आत्मा की ज्योति प्रकट होगी और उसे प्रकाश का महत्त्व समझ में आएगा। जब सूर्य निकलता है तो दीपक के प्रकाश का कोई महत्त्व नहीं है, यदि चारों तरफ अंधेरा है और एक जलता हुआ दीपक किसी को दिख जाए तो राही वहां पर उसे संकेत बनाकर उस दिशा में चलता तो उस दीपक के माध्यम से उसे रास्ता मिल जाता है।
दीपावली भी एक ऐसा ही संकेत है कि हम अपने अनादिकाल के मिथ्यात्व के अंधकार को सम्यक्त्व के प्रकाश से प्रकाशित करें।
उन्होंने आगे फरमाया कि दीपावली की रात में की हुई साधना-आराधना आपकी अंतर ज्योति को जागृत करती हैं। जहां चारों तरफ कई लोग अंधकार, मिथ्यात्व में पड़े हुए हैं लक्ष्मी की पूजा, पटाखे फोड़ने में लगे हुए हैं, लेकिन आत्मार्थी साधक आत्मा की ज्योति जलाने में लगा रहता है। एक बार साधक को यदि आत्मा के प्रति रूचि जागृत हो गई तो फिर साल भर वह आनन्द का अनुभव कर सकता है। फिर उसे आनन्द हेतु किसी से किसी प्रकार की याचना की जरूरत नहीं रहेगी।
इससे पूर्व श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी द्वारा भगवान महावीर की अंतिम वाणी श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 33 से 36 वें अध्ययन तक की 174 मूल गाथा तक वांचना एवं संक्षिप्त विवेचन किया गया। जिसमें फरमाया कि असंयम से कर्म-बंधन होता है और संयम से कर्म मुक्ति। कषाययुक्त अशुभयोग कर्मबन्धन का कारण है। संसार में कर्मों का ही खेल है। शुभाशुभ योग का मूल आधार शुभ एवं अशुभ लेश्याएं हैं।
आगे के अध्ययन में फरमाया कि अणगार जिसका कोई आगार अर्थात घर नहीं होता जिसने घर आदि का त्याग कर दिया, केवल बाहर का त्याग जरूरी नहीं है, उसको भीतर का त्याग करना होगा। भीतर की ग्रंथियों को नहीं छोड़ा तो फिर वह अणगार कहलाने के योग्य नहीं। भीतर से असंग होना भीतर में कषाय मोह मिथ्यात्व के भाव से दूर होना हैं। जो मिथ्यात्व और मोह को त्यागता है वह भीतर से अणगार बनता है। केवल बाह्य संग का त्याग ही पर्याप्त नहीं है, भीतर से भी असंग होना आवश्यक है। जब तक देह आदि के प्रति रागादि सम्बन्ध हैं, तब तक साधक भीतर से असंग नहीं बन सकता। अतः जीवन काल में देह आदि के प्रति शनैः शनैः आसक्ति कम करने का अभ्यास करे, यही अणगार मार्ग गति है।
आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की चार दिवसीय मौन आत्म ध्यान साधना गतिमान है। वीर निर्वाण संवत का मंगल पाठ 2 नवम्बर 2024 को प्रातः 7.30 बजे आत्म भवन अवध संगरीला, बलेश्वर में प्रदान करेंगे, जिसका सीधा प्रसारण यूट्यूब चैनल पर होगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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