आचार्य सम्राट डॉ. श्री शिवमुनि जी म.सा. के सान्निध्य में श्रमण संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आज उपस्थित धर्म सभा को आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि आज प्रभु भगवान महावीर का निर्वाण दिवस है। प्रभु महावीर ने जड़ और जीव का भेद करके जीव को महत्त्व देकर जीव के अष्टगुणों को प्रकट कर घाती कर्मों को क्षय कर दिया।
उन्होंने आत्म ध्यान का प्रयोग करवाते हुए फरमाया कि इस निराकार आत्मा में जो अष्टगुण हैं अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख, अनंत शक्ति इसको प्रकट करें। इसको प्रकटाने के लिए आत्म ध्यान के द्वारा शुक्ल ध्यान की जो शुद्ध वीतराग विधि प्राप्त हुई है उसका प्रयोग आज के दिन विशेष रूप से प्रयोग करें। तीर्थंकरों के कल्याणक का समय विशेष समय होता है जब हमारा पराक्रम श्रद्धा भाव के साथ तीव्रता की ओर बढ़ता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि आज की दीपावली अपने भीतर की समृद्धि का, अनंत सुख का जो धन है, उसको प्रकटाने का दिवस है। इसकी प्राप्ति हेतु पराक्रम करें। जीव को जीव में स्थित करना है, पिण्ड को पराया मानना है कि, पुद्गल की प्रार्थना नहीं करनी है। अपने जैसे ब्रह्माण्ड के सभी जीव है व सबमें मैं जीव अकेला हूं इस एकत्व का अनुभव करना है। अस्तित्व पर श्रद्धा को परिपक्व करना है। शुक्ल ध्यान की अखण्ड धारा को बहाना है। जैसे-जैसे शुक्ल ध्यान की धारा अखण्ड बहती चली जाए, हम स्वयं निर्वाण पथ पर आगे बढ़ते जाएंगे। जो प्रभु महावीर ने लगातार 16 प्रहर तक उद्बोधन देकर हम सभी को ज्ञान का सार श्री उत्तराध्ययन सूत्र प्रदान किया, उसका सारांश यही शुक्ल ध्यान है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी द्वारा भगवान महावीर की अंतिम वाणी श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 27 से 32 अध्ययन तक की मूल वांचना एवं संक्षिप्त विवेचन फरमाया कि संघ-व्यवस्था के लिए अनुशासन आवश्यक है। अनुशासन के अभाव में आत्म-कल्याण नहीं हो सकता। ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप, ये मोक्ष मार्ग के अंग हैं और इनकी परिपूर्णता से ही कैवल्य और मोक्ष है। तप एक दिव्य और भव्य रसायन है, जो साधक को बंध दशा से हटाकर निर्जरा दशा में स्थिर करता है। दो प्रकार के तप बाह्य और आंतरिक तप है जिनके छह-छह भेद बताए गये हैं, निर्जरा तप के आधार पर होती है जिसमें स्वाध्याय, ध्यान, आलोचना आदि आगे के अध्ययन में फरमाया कि विवेकयुक्त प्रवृत्ति चरणविधि है, जिससे संयम परिपुष्ट होता है। अविवेकयुक्त प्रवृत्ति से संयम दूषित होता है, आराधना में प्रमाद सबसे बड़ा बाधक है, प्रमाद का मूल राग-द्वेष है। राग-द्वेष को त्याग कर व्यक्ति अप्रमत्त रूप से आगे बढ़ जाता है। प्रत्येक जीव को विवेक युक्त जीवन जीते हुए अप्रमत्त दशा को प्राप्त करना है।
आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. की चार दिवसीय मौन आत्म ध्यान साधना गतिमान है। वीर निर्वाण संवत का मंगल पाठ 2 नवम्बर 2024 को प्रातः 7.30 बजे आत्म भवन अवध संगरीला, बलेश्वर में प्रदान करेंगे, जिसका सीधा प्रसारण यूट्यूब चैनल पर होगा।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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