

श्रमण संघीय तृतीय पट्टधर आचार्य सम्राट पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म.सा. का जन्म जन्म जयंती पर श्रमणी संघीय मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. उनके जीवन प्रसंगों के उल्लेख में फरमाया कि आचार्य सम्राट् पूज्य श्री देवेन्द्र मुनि जी म.सा. जन्म उदयपुर में हुआ। बाल्यावस्था में उन्होंने दीक्षा ग्रहण की। अपने गुरूदेव उपाध्याय श्री पुष्कर मुनि जी महाराज के दिशा निर्देशन में ज्ञान, ध्यान, साधना करते हुए आपने अपने जीवन में ऊंचाईयों के आसमान को छुआ है। एक सामान्य साधु से आचार्य पद तक पहुंचना कोई कम बात नहीं होती। आपका जीवन स्वाध्याय से परिपूर्ण था। आपने अपना अधिकांश समय लेखन, पठन और आत्म-चिन्तन में व्यतीत किया। आपने करीब 350 से अधिक पुस्तकें लिखकर जैन साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान दिया। इससे पता चलता है कि आपके जीवन में ज्ञान के प्रति कितनी रूचि थी और आपश्रीजी ने इन पुस्तकों के लेखन संपादन में कितनी कड़ी मेहनत की होगी। आपका यह कार्य आपके श्रमणत्व को सार्थक करता है
श्रमशीलता एवं मधुरता यह आपके विशेष सद्गुण थे जो प्रत्येक व्यक्ति को अपनाने चाहिए। नाशिक संत समागम में आपके साथ व्यतीत हुए स्वर्णिम पल हमारी पूंजी है। उस समय में आपने आचार्य श्री शिवमुनि जी (तत्कालीन युवाचार्य श्री जी) को सम्बोधित करते हुए कहा था कि आपका जीवन सरल है है। ध्यान साधना करके यह और अधिक स्फटिक मणि के समान उज्ज्वल और निर्मल हो गया है।
इससे पूर्व युवामनीषी सहमंत्री श्री शुभम मुनि जी द्वारा भगवान महावीर की अंतिम वाणी श्री उत्तराध्ययन सूत्र के 13 से 19 अध्ययन तक मूल वांचना एवं संक्षिप्त विवेचन किया गया सच्ची साधुता त्याग में है। त्याग से व्यक्ति मोक्ष सुख को प्राप्त कर सकता है। चित्त संभुत मुनि ब्रह्मदत्त चक्रवती भृगुपुरोहित का कथानक हमें संयम जीवन के स्वीकार की ओर प्रेरित करता है। भिक्षु कौन है? भिक्षु को कैसे ब्रह्मचर्य की आराधना करनी चाहिए। पाप श्रमण, अभय दाता एवं मृगापुत्र के
अध्ययन से हमें अपने जीवन में त्याग की प्रेरणा लेकर संयम में पुरुषार्थ करना चाहिए।
विशेष – आत्मज्ञानी सद्गुरुदेव आचार्य सम्राटा डॉ. शिवमुनि जी म.सा. दिनांक 29 अक्टूबर से 1 नवम्बर 2024 तक चार दिवसीय मौन आत्म ध्यान साधना में रहेंगे। वीर निर्वाण संवत का मंगलपाठ दिनांक 2 नवम्बर को प्रातः 8 बजे प्रदान करेंगे
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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