श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने दैनिक प्रवचन में फरमाया कि जैनधर्म के जितने शास्त्र हैं, सब आध्यात्मिक हैं। जीवन के लौकिक पक्ष का इसने अधिक महत्त्व स्वीकार नहीं किया। आध्यात्मिकता के पथ पर आकर ही वास्तविक जीवन प्रारम्भ होता है। स्थानांग सूत्र में चार प्रकार के लोग बताये हैं कुछ लोग प्रियधर्मी होते हैं, दृढ़धर्मी नहीं होते हैं। कुछ लोग दृढ़धर्मी होते हैं, प्रियधर्मी नहीं होते है। कुछ लोग प्रियधर्मी भी होते हैं, दृढ़धर्मी भी होते हैं। कुछ लोग प्रियधर्मी भी नहीं होते हैं और दृढ़धर्मी भी नहीं होते हैं। इन चतुर्विध लोगों में से कामदेव श्रावक प्रियधर्मी भी है, दृढ़धर्मी भी है। उसे धर्म प्रिय है, तभी उसने व्रत मार्ग अंगीकार किया है।
उन्होंने आगे फरमाया कि प्रत्येक साधना की श्रेणियां है। एक बालक प्रथम कक्षा से विद्यारम्भ करके एम. ए., पी. एच. डी. भी कर लेता है। व्यक्ति क्रमशः आगे बढ़ता है। आगे बढ़ने के लिए शनैः शनैः प्रगति करनी पड़ती है। खड़ा हुआ व्यक्ति प्रगति नहीं कर सकता। चरण में गति हो तो प्रगति होती है। विकास करते-करते व्यक्ति चरम लक्ष्य तक पहुंच जाता है। शनै-शनै साधना करते हुए कामदेव श्रावक धर्मध्यान की साधना करते हुए शुक्ल ध्यान तक पहुंच गया।
उन्होंने फरमाया कि मीठी वाणी के कारण लोग तोते को पिंजरे में डाल देते हैं। उसका गुण ही बन्धन का कारण बन जाता है। कौए को पिंजरे में कौन डालकर रखता है? सारा दिन कांय-काय करता रहेगा। कामदेव की साधना की विशेषता उसके लिए परीक्षा बन गई। इन्द्र की सभा में एक मिथ्यात्वी देव उपस्थित था। सम्यग्दृष्टि कभी ईर्ष्या नहीं करता क्योंकि वह दूसरे की उपलब्धि को दूसरे का कर्मफल मानता है। मिथ्यात्वी ऐसी आस्था नहीं रखता।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में तत्वार्थ सूत्र का वांचन करते हुए फरमाया कि मनुष्य जन्म का अनमोल समय, वह सारा समय हम मोह कर्म में दे रहे हैं। जो अपना स्वयं का है उसके लिए समय नहीं है, सभी पर को अपना माने हुए हैं। नाम कर्म को लेकर तनाव मत करो। जीव के प्रति प्रेम बढ़ाओ। आकार को लेकर जितनी चिंता है सब आर्त्त रौद्र ध्यान हैं। आकार को लेकर चिंतन आए उसी समय सोचना मैं तो अमूर्त्त हूं।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘हम बस मिलकर प्रभु चरणों में नित उठ शीश झुकाएं, जिनवर के गुण गाएं’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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