जीवन का आधार है विश्वास |

24 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने उपासकदशांग सूत्र के दूसरे अध्याय ‘कामदेव’ के दृष्टांत का उल्लेख करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि यह अध्ययन आत्म-विश्वास और सम्यग्दर्शन का सजीव उदाहरण है। जीवन में विश्वास का बहुत बड़ा स्थान रहता है। विश्वास व्यवहार और आचार का प्राण होता है। जिस व्यक्ति पर आपका विश्वास नहीं रहता, उससे आपके व्यवहार बन्द हो जाते हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हर व्यक्ति आशा और विश्वास लेकर चलता है। लौकिक जीवन में जहां विश्वास का बहुत बड़ा स्थान है, ऐसे आध्यात्मिक जीवन में भी विश्वास का अत्यधिक मूल्य है। जैन दर्शन ने इसे सम्यग्दर्शन कहा है। सनातन लोग इसे श्रद्धा का नाम देते हैं। मुस्लिम इसे ईमान कहते हैं। ईसाई इसे फेथ कहते हैं। जैन धर्म ने इसे सम्यग्दर्शन, श्रद्धान कहा है।

उन्होंने आगे अपने उद्बोधन में फरमाया कि नौ तत्त्व-जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आश्रव, संवर, निर्जरा, बंध और मोक्ष। छः द्रव्य-धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, काल, पुद्गल और जीव इस पर जीव का दृढ़ विश्वास ही सम्यग्दर्शन है। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति, सुख हो या दुःख, उसमें दृढ़ रहने के निश्चय को श्रद्धान कहते हैं। विश्वास सम्यक् होना चाहिए। सम्यक् देव, गुरु, धर्म पर विश्वास होना सम्यग्दर्शन है। सम्यक्त्व पाठ में कहा है अरिहंत मेरे देव हैं। जीवन पर्यंत अरिहंत के मार्ग पर जो चलते हैं और साधक को भी उसी मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं, वे गुरु हैं। अरिहंतों द्वारा बताया गया मार्ग धर्म है, यही सम्यक्त्व है।

उन्होंने फरमाया कि आज देव नहीं हैं, पर गुरु हैं। मुनि त्याग का एक सजीव रूप है। सब कुछ त्याग दिया, जीवन का मोह भी त्याग देता है। मुनि की भूमिका पर पहुंचकर कभी वह वीतरागता के शिखर पर पहुंच जाता है। सबकी श्रद्धा अपने-अपने सम्प्रदाय के साधुओं में सीमित हो गई है। इस श्रद्धा का केन्द्र बाह्य है, किन्तु जहां तक गुरु की श्रद्धा का सम्बन्ध है, वह सम्बन्ध है गुरु के गुणों से, पांच महाव्रत और बाह्य आन्तरिक चारित्र से। जो मनसा वाचा कर्मणा मर्यादाओं और आचार का पालन करता है, वह गुरु है।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि जब तक बंध नहीं रूकेगा तब तक मुक्ति संभव नहीं हैं। व्यक्ति मिथ्यात्व के कारण शरीर को सबकुछ मानता है और आत्मा को गौण कर देता है। व्यक्ति अपना पूरा जीवन नाम, पद, प्रतिष्ठा के लिए दे देता है, किंतु इस संसार से जाता है तो वह अपने साथ कार्मण शरीर को साथ लेकर जाता है, एक पुद्गल भी उनके साथ नहीं जाता। यदि जड़ को जड़ और जीव को जीव मानते हैं तो साधक शीघ्र ही अपने लक्ष्य सिद्धशिला की ओर आगे बढ़ता है। जीव का पहला कर्त्तव्य है आत्मा का उद्धार करना और आत्मा को समय देना।

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘मान मेरा कहना नहीं तो पछताएगा मिट्टी का खिलोना मिट््टी में मिल जाएगा’’ भजन की प्रस्तुति दी।

- आचार्य शिवमुनि

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