आनन्द श्रावक जैसा जीवन जीने का लक्ष्य रखें |

23 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि गौतम भगवान महावीर के सबसे बड़े शिष्य थे। चार ज्ञान उनके पास थे। बेले बेले तप का वे पारणा करते हैं। पहले स्वाध्याय करते हैं, फिर ध्यान लगाते हैं, तीसरे प्रहर में गोचरी के लिए निकलते हैं। चतुर्थ प्रहर में फिर स्वाध्याय करते हैं। गौतम स्वामी ने भगवान महावीर से अनुज्ञा चाही कि प्रभो! मेरा बेले का पारणा है। मैं पारणे के लिए नगर में जाना चाहता हूं। भगवान महावीर ने आज्ञा प्रदान कर दी। गौतम स्वामी ने प्रभु की अनुज्ञा ली और गोचरी के लिए निकल पड़े। गोचरी लेकर कोल्लाक सन्निवेश के निकट से गुजरे। वहां लोग चर्चा कर रहे थे कि आनंद श्रमणोपासक संलेखना में स्थित है। ऐसी चर्चा गौतम ने लोगों के मुख से सुनी। गौतम को विचार आया कि आनंद भगवान महावीर का श्रावक है। वह संलेखना में स्थित है। अब वह स्वयं भगवान महावीर के पास जाने में शारीरिक दृष्टि से समर्थ नहीं है। इसीलिए मुझे चाहिए कि मैं स्वयं उसे जाकर दर्शन दूं। गौतम आनंद की पौषधशाला में पहुंच गए।

उन्होंने आगे फरमाया कि आनंद ने जब गौतम स्वामी को आते हुए देखा तो उसने अपनी शय्या छोड़ने का प्रयास किया, परन्तु वह उठ नहीं सका। इतना अशक्त हो गया था। उसने गौतम को निवेदन किया कि भगवन्। मैं तपस्या के कारण अति दुर्बल हो गया हूं। मैं स्वस्थान छोड़कर आपके चरणों के निकट नहीं आ सकता। इसीलिए आप मेरे निकट आ जाइए। गौतम सहजभाव से निकट आ गए। उसने अपना मस्तक उनके चरणों पर रख दिया। तब गौतम को उसने कहा-भगवन्। क्या श्रावक को तपस्या से अवधिज्ञान हो सकता है? गौतम आनंद को कहने लगे इतना ज्ञान! इतना विशाल अवधिज्ञान श्रावक को नहीं हो सकता। आप गलत कहते हैं। इसीलिए जो आपने गलत बोला है, उसकी आलोचना करो। उसकी शुद्धि करो क्योंकि आप संलेखना में हैं। कभी भी ये प्राण छूट सकते हैं। ऐसा न हो कि यह अहंकार, यह भूल आपके साथ चली जाए। आनंद श्रावक ने हाथ जोड़कर कहा-भगवन्! मैंने जो कहा, सत्य कहा। प्रायश्चित्त का स्थान मुझे नहीं आता। मेरा यह विचार है कि आप चूक गए हैं। आपने उपयोग नहीं लगाया। श्रावक को उन्होंने कहा, श्रावक ने उन्हें कहा, उन्होंने सुन लिया और भिक्षापात्र लेकर वे सीधा भगवान महावीर के चरणों में आ गए।

उन्होंने फरमाया गोचरी भगवान महावीर को दिखाई। आनंद की पौषधशाला में जाने की बात उन्होंने उन्हें हाथ जोड़कर सुनाई क्योंकि प्रभु की ऐसी आज्ञा लेकर वे नहीं गए थे। उन्होंने भगवान महावीर को बताया कि आनंद ने इतना अवधिज्ञान प्राप्त होने की बात की थी, मैंने कहा इतना अवधिज्ञान श्रावक को नहीं हो सकता। भगवान महावीर ने कहा-गौतम! तुम मेरे ज्येष्ठ शिष्य हो, चार ज्ञान के धारी हो। विनीत भी हो। बुरा नहीं मानोगे। इसीलिए कहता हूं। वस्तुतः आनंद सत्य कह रहा है। इतना अवधिज्ञान श्रावक को हो सकता है। आपने जो नकारा है, यह असत्य है। आपकी बात गलत है और श्रावक की बात बिल्कुल ठीक है। इस तथ्य को नकारने से आनंद को दुःख हुआ। उसके सत्य की अवहेलना हुई है। यदि वस्तुतः आप विनीत हैं सत्य के उपासक हैं, राग-द्वेष का आपकी साधना विजेता बनने की है। बेले बेले पारणा करने का इतना लाभ नहीं होगा, जितना लाभ उस श्रावक के यहां जाकर उससे क्षमायाचना करने से होगा।

उन्हेांने फरमाया गौतम आनंद के घर गए और उससे क्षमायाचना की। उसने कहा-क्षमा की कोई बात नहीं। मैंने तो सत्य बात कही थी। यह क्षमा मुझे संतोष देने के लिए नहीं, आपकी आत्मा की शुद्धि के लिए है। मैं स्वयं में परितुष्ट हूं क्योंकि मैं जानता हूं कि जो कुछ मैंने कहा, वह सत्य है। यह आपकी महानता है। गौतम स्वामी वापिस आ गए। आनंद का आयुष्य समाप्त हो गया। दीपक में तेल समाप्त हो जाए, दीपक बुझ जाता है। आनंद ने अपना शरीर त्याग दिया। वह प्रथम देवलोक के अरुणाभ विमान में जाकर देवता बना। इधर गौतम भी महावीर से पूछते हैं कि वहां उसका कितना आयुष्य है? प्रभु बताते हैं कि चार पल्योपम का उसका आयुष्य है। उसके बाद महाविदेह क्षेत्र में जन्म लेकर वह मोक्ष को, परिनिर्वाण को प्राप्त करेगा।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि मोक्ष मार्ग के लिए साधक को जीव और अजीव का भेदज्ञान होना चाहिए। जब भेद ज्ञान हो जाए तो जीव पर श्रद्धा होनी चाहिए। जीव पर श्रद्धा हो जाए तो बंध के कारण को रोकना है, बंध के कारण रोक दिया तब फिर संवर

निर्जरा के माध्यम से पूर्व संचित कर्मों को क्षय करता हुआ साधक बहुत ही निकट समय में मोक्ष मार्ग तक जा सकता है।

प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘पाया नर तन पाया, क्या पाकर लाभ कमाया’’ भजन की प्रस्तुति दी।

आज की सभा में बैंगलोर से श्रीरामपुरम संघ एवं आमरोली से चंदन बाला महिला मण्डल गुरु दर्शन हेतु उपस्थित हुआ।

- आचार्य शिवमुनि

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