श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि एक व्यक्ति किसी गांव में जा रहा है किसी कामकाज के लिए। वह अपने साथ खाने-पीने का सामान लेकर जा रहा है। दूर जाना है। उसे लम्बे मार्ग की चिंता नहीं है। जिसके पास पाथेय है, वह जाता हुआ सुखी होता है। कहीं भूख लगती है, खा लेता है। कहीं प्यास लगती है, पानी पी लेता है। वह पराधीन बनकर दूसरे के मुख की ओर ताकता नहीं है। इसी प्रकार धर्म का पाथेय लेकर जो परलोक के मार्ग पर चलता है, वह उस मार्ग पर जाता हुआ सुखी हो जाता है। उसका पापकर्म भी कम होता है। इसी कारण किसी प्रकार की पीड़ा, वेदना, क्लेश या दुःख उसके जीवन में कदापि नहीं आता क्योंकि धर्म रूपी पाथेय उसके पास रहता है।
उन्होंने आगे फरमाया कि जैन धर्म ने दो प्रकार के श्रावक कहे हैं, एक बारहव्रती, एक प्रतिमाधारी श्रावक। प्रतिमाधारी श्रावक उच्चकोटि के श्रावक होते हैं। प्रतिमा का अर्थ- जब व्यक्ति मनसा, वाचा, कर्मणा अपने ग्रहण किये हुए व्रत का पालन करता है, ज्ञान और श्रद्धा में वह केवल व्रत है, किन्तु जब उस ज्ञान और श्रद्धा का आचार में बिम्ब बन जाता है, उसे प्रतिमा कहा जाता है।
उन्होंने आनन्द के ग्यारह प्रतिमा धारण करने के बारे में फरमाया कि आनन्द श्रावक ने दर्शन प्रतिमा में अपने विश्वास, श्रद्धान को दृढ़ किया। व्रत प्रतिमा में बारह व्रतों को धारण करता है। सामायिक प्रतिमा में वह दिन में तीन बार सामायिक करता है। पौषध प्रतिमा में वह अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि पर्व तिथियों में पौषध लेता है। ध्यान प्रतिमा में वह रात्रि के समय ध्यान लगाने की साधना करता है। ब्रह्मचर्य प्रतिमा में वह आत्मनिष्ठ हो जाता है। सचित्त आहारवर्जन प्रतिमा में वह सचित्त वनस्पति का आहार भी त्याग कर देता है। स्वयं आरंभ वर्जन प्रतिमा में स्वयं आरम्भ करने का त्याग कर देता है। उसने आदेश देने का त्याग कर दिया। जो चीज़ मेरे निमित्त बनेगी, मैं वह नहीं लूंगा। जो चीज़ दूसरे ने अपने लिए बनाई है, वही चीज़ मैं लूंगा ऐसा संकल्प किया। श्रमणभूत प्रतिमा में वह श्रमण की तरह बन गया। इस प्रकार श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओं की उसने साधना की। इसमें उसे साढ़े पांच वर्ष लग गए।
उन्होेंने आगे फरमाया कि आनंद श्रावक श्रमणभूत बन गया है। उसने सोचा-मैं अब इस पौषधशाला को छोड़कर घर नहीं जाऊंगा। अब उसे शिवानंदा का कोई मोह नहीं है। पुत्र क्या कर रहा है? कामकाज ठीक चल रहा है या नहीं चल रहा? लोग उससे संतुष्ट हैं या नहीं? कारोबार की स्थिति कैसी है, वह इन सब चिंताओं से मुक्त हो गया है। अब वह यह चाहता है कि मेरा शेष जीवन समाधि में बीत जाए। राग-द्वेष, सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल, शाप-आशीर्वाद, ह्रास-विकास, उत्थान-पतन, उदय-अस्त, संयोग-वियोग, मनोज्ञ-अमनोज्ञ इस प्रकार के द्वन्द्वों से वह ऊपर उठ गया है। अब वह सदैव समाधि में रहना चाहता है। उसने संकल्प कर लिया कि मेरा शरीर सूख गया है, अब मैं अधिक दिन इस धरती पर नहीं हूं। मुझे अब संलेखना ले लेनी चाहिए। अपने आयुष्य कर्म की समाप्ति का मृत्यु को घड़ी को निकट जानकर उस आनंद ने स्वयं हो संलेखना व्रत अंगीकार कर लिया। मानों अब वह संलेखना के क्षणों में बैठ गया है। उसने अपने शरीर का भी व्यामोह त्याग दिया है। पहले वह शरीर को आहार के रूप में कुछ देता था, अब उसने आहार ग्रहण करना भी बंद कर दिया। भक्त प्रत्याख्यान रूप में उसने संलेखना ग्रहण कर ली और आत्मचिंतन में वह व्यस्त हो गया।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि अपने द्वारा अपनी न्याय नीति से कमाया हुआ धन उसका त्याग करना दान है। परिग्रह अपने आप में पाप है उसको पुण्य में बदलने के लिए स्व और पर कल्याण के लिए त्याग करना पुण्य हैं। स्व का उपकार इसलिए होता है कि उसे न्याय नीति से कमाते हुए जो पाप का बंध हुआ दान देकर उसे हल्का किया जा सकता है।
मधुर गायक श्री निशांत मुनि जी म. सा. ने ‘‘शासन मिला प्रभु का सौभाग्य है हमारा, आराधना हो ऐसी नहीं जन्म ले दुबारा’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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