श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि साधक जब स्वयं में स्थित होता है तो उसका मिथ्यात्व टूटता जाता है। पुद्गल को छोड़कर एक आत्मा में आ जाने से आर्त्त-रौद्र ध्यान भी छूट जाता है। व्यक्ति की इस साढे तीन हाथ की काया में केवल आत्म प्रदेशों का विस्तार है वह तुम हो, वही सत्य है। खुली आंखों से ध्यान करो। बंद आंखों से भीतर उतरते चले जाओ। जड़ जीव का भेद करते चले जाओ, जितना भेद गहरा होगा उतना ध्यान अच्छा होगा। मन, बुद्धि, इन्द्रियां तीनों को गौण कर दो। यह स्वस्थिति का महत्त्व देना। विचारों को महत्त्व मत दो। हर पल होश में रहो। अपनी काया के मोह को तोड़ो, यह पिण्ड पराया है। काया सिद्ध गति में बाधक है। बार-बार पुरुषार्थ करो, अपने में स्थित होकर के आत्मा के भीतर अष्टगुण प्रकटेंगे। केवल जीव को महत्त्व दो।
उन्होंने निवास स्थान का परिचय देते हुए फरमाया कि जिस साढ़े तीन हाथ की काया में आत्म प्रदेशों ने विस्तार किया है उसका परिचय है-कान सुनते हैं, आंखें देखती है, नासिका के माध्यम से गंध आती है, जिह्वा के माध्यम से स्वाद चखे जाते हैं, स्पर्शनेन्द्रिय के माध्यम से स्पर्श किया जाता है। उसमें सिर, बुद्धि, चेहरा, कंधे, भुजा, हाथ है। जिसमें हृदय धड़कता है। भूख लगती है। भोजन जो मुख से लिया जाता है वह आंतों में एक प्रक्रिया से गुजरता है। पीठ, कमर, जंघा, घुटने, पांव आदि है। इस देह का निर्माण गर्भ में हुआ और अंत शमशान में होगा। देह का नाम, सौंदर्य, संबंधी है।
उन्होंने फरमाया कि निवासी कैसा है? अमूर्त है यानि निराकार है। अजन्मा है, अमर है, शाश्वत है। केवलज्ञान, केवलदर्शन से युक्त है। अनादिकाल से चार गति में विचरण कर रहा है। न इसे भूख है, न इसे प्यास है। न वेदना है, न संवेदना है। न यह पुरुष है, न यह स्त्री है। न यह मनुष्य है, न यह देव है। न यह किसी का है, न कोई इसका है। न यह कर्त्ता है न भोक्ता है।
इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का वांचन करते हुए फरमाया कि मन, वचन, काया से किसी प्राणी को कष्ट देना हिंसा है। हिंसा दो प्रकार की है द्रव्य और भाव। भाव बेहोशी में होती है, स्वरूप का भान नहीं है उसमें क्रिया लगती है वह भाव हिंसा है। द्रव्य हिंसा आरंभ-समारंभ जिसमें फैक्ट्री आदि में होती है।
प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म. सा. ने ‘‘जो गम किसी को हमने दिये हैं, वो गम तो हमको लेने पड़ेंगे’’ भजन की प्रस्तुति दी।
भारतीय धर्मों में मोक्ष की अवधारणा पर शोध करते हुए मैंने जाना कि सब धर्मों में कॉमन है – ध्यान । तीस वर्षों की मेरी ध्यान साधना का सार है- “ आत्म ध्यान ” । यह कम्प्यूटर के डिलीट बटन की तरह साधक के मन मानस से गैरजरूरी यादें, संस्मरण, नकारात्मकता डिलीट कर देता है। अंतर्मन शांत, शुद्ध और सात्विक हो जाने से आत्म ध्यान का साधक सकारात्मक सोचने लगता है।
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