स्वयं को चार गति से मुक्त करें |

14 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर ध्यान गुरु आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. के सान्निध्य में एवं शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के तत्वावधान में आज सोमवार को पंच दिवसीय शिक्षक प्रशिक्षण शिविर का प्रारंभ हुआ। शिविर में वीतराग साधिका निशाजी जैन ने ध्यान एवं श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने आसन, प्राणायाम करवाया एवं तत्वार्थ सूत्र का वांचन करवाया।

आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनि जी म.सा. ने शिविरार्थियों को संबोधित करते हुए अपने उद्बोधन में फरमाया कि पंचम काल में चारों ओर मिथ्यात्व का वातावरण है। व्यक्ति कहीं पर भी हो जब वह प्रभु की वाणी सुनता है और जीव का चिंतन करता तब समकित का पोषण होता है। जब वह संसार के बीच होता है और संसार का चिंतन करता है तो उसका मिथ्यात्व भारी हो जाता है। देह को अपना मान लेता है और जीव को पराया वह मिथ्या दर्शन शल्य है, किंतु जीव के बिना इस देह का भी कोई महत्त्व नहीं रहता, इस देह में जो जीव है उसे महत्त्व देना चाहिए। जब तक इस पिण्ड का मोह नहीं छूटता तब तक व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता।

उन्होंने मुक्ति के लिए उपयोगी सूत्र बताते हुए फरमाया कि स्वयं को जानें, स्वयं पर श्रद्धा करें, स्वयं को चार गति से मुक्त करें, स्वयं से प्रेम करें, स्वयं पर करूणा करें, स्वयं के हो जाएं और स्वयं का चिंतन करें। स्वयं में जाकर स्वयं के भीतर विद्यमान गुणों को प्रकट होने दें। स्वयं में स्वयं को स्थिर कर स्वयं के मुक्ति के कारण बने।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र का वांचन करते हुए फरमाया कि व्यक्ति को पाप से बचना है तो पाप विरति की भावना रखनी चाहिए। पाप विरति में व्यक्ति यह सोचे कि अगर हिंसा करूंगा इसका फल क्या मिलेगा। हिंसा करते समय उस जीव को कितना कष्ट होता होगा और इसका फल जरूर भोगना पड़ेगा, इससे वर्तमान गति भी खराब होगी और अगला जन्म भी खराब होगा। मरने के बाद नरक गति में जाना पड़ेगा। ऐसा भाव करने से हिंसा से बच सकते हैं।

उन्होंने मित्र और मैत्री की चर्चा करते हुए फरमाया कि मित्र कभी दुश्मन भी हो जाता है किंतु मैत्री में ऐसा नहीं हो सकता। प्राणी जगत के जीवों के प्रति मैत्री और कल्याण की भावना रखने वाला व्यक्ति हिंसा नहीं कर सकता।

- आचार्य शिवमुनि

For causes
that really matter