स्त्री-पुरुष दोनों का जीवन एक होना चाहिए |

13 OCTOBER 2024

श्रमण संघीय चतुर्थ पट्टधर आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. ने रविवार को अपने उद्बोधन में फरमाया कि भगवान महावीर ने तीर्थ रूपी साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका जो चार स्तंभ है, उनको महत्त्व दिया। यदि श्रावक अपने नियमानुसार बारह व्रत धारण करता है तो मोक्ष जा सकता है। आगम की वाणी का सार है कि आत्मा परमात्मा बन सकती है। निश्चयनय में सत्य एक ही है व्यक्ति अस्तित्व का बोध प्राप्त करे। अस्तित्व का बोध प्राप्त कर, जानकर, समझकर, उसमें उतरने का प्रयास करना चाहिए। जब जीव जीव में उतरने का प्रयास करता है तो वहां से शुक्ल ध्यान की धारा शुरू होती है। तीन ध्यान छोड़ना है – आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान और धर्म ध्यान। धर्म ध्यान सहायक है किंतु वह मोक्ष तक नहीं ले जा सकता। मोक्ष तक जाने के लिए है शुक्ल ध्यान। शुक्ल ध्यान का अर्थ है जीव का जीव में स्थित होना।

उन्होंने फरमाया कि भगवान महावीर के दस श्रावकों में आनन्द श्रावक श्रेष्ठ था उसने बारह व्रत स्वीकार कर वह अपनी पत्नी को बताता है कि मैंने भगवान महावीर से श्रावक व्रत धारण किया है, आनन्द की पत्नी शिवानन्दा भी व्रत धारण करने के लिए रथ पर आरूढ होकर भगवान महावीर के समवसरण में पहुंच जाती है। विधिपूर्वक वंदना करके वह उनके चरण कमलों में आकर बैठ जाती है। भगवान महावीर ने उसे बारह व्रतों का स्वरूप समझाया। विवेचन सुन लेने के अनंतर उसने भगवान महावीर से कहा कि मैं भी श्राविका बनना चाहती हूं। भगवान ने कहा- हे देवानुप्रिय! जैसा आपको सुख हो, वैसा करो, धर्म करने में देरी नहीं शीघ्र करो। भगवान महावीर के ये ही वचन होते थे यानि व्रतों को ग्रहण करने की बात वे साधक पर छोड़ देते थे। वे उसका दायित्व स्वयं पर नहीं लेते थे।

शिवानंदा संकल्प लेकर गई थी कि मुझे श्रमणोपासिका बनना है और अपने पति से अलग नहीं रहना। यही समर्पण है। स्त्री-पुरुष दोनों का जीवन एक होना चाहिए। शिवानंदा ने बारह व्रत स्वेच्छा से ग्रहण किए।

शिवानंदा स्वेच्छा से व्रत धारण कर वापिस लौट आई और उसने यह सूचना आंनद को दी कि आपने जिस पुनीत कार्य के लिए मुझे भेजा था; मैं उसके अनुसार व्रत लेकर आ गई हूं। तब आनंद ने कहा-देवानुप्रिय। आपने बहुत अच्छा कार्य किया। मैं व्रत ग्रहण करने पर आपका अभिनंदन करता हूं। मेरा विश्वास है कि हम दोनों का मार्ग एक हो गया है। हमारी दृष्टि, हमारे हृदय, हमारे व्रत एक हो गए हैं। हम इस जीवन में एक दूसरे के सहयोगी बनकर चलेंगे। हमारा जीवन सुखी रहेगा। आगे भी हमें सुखमय जीवन की उपलब्धि हो सकेगी।

इससे पूर्व श्रमण संघीय प्रमुख मंत्री श्री शिरीष मुनि जी म.सा. ने तत्वार्थ सूत्र के सातवें अध्याय में उल्लेखित व्रत के स्वरूप एवं उनके प्रकार की चर्चा करते हुए फरमाया कि व्रत दो प्रकार के हैं अणुव्रत और महाव्रत। व्यक्ति जब भी मन, वचन, काया, विभाव, परचिंतन में जाए उस समय भावना जागृत करनी है। इनमें स्थिर रहने के लिए प्रत्येक व्रत की पांच-पांच भावनाएं है इन भावनाओं के प्रति जागरूक रहने पर स्थिरता आ जाती है।

इससे पूर्व प्रवचन प्रभाकर श्री शमित मुनि जी म.सा. ने ‘‘ढूंढों अंदर ढूंढो अमृत यदि पाना चाहो’’ भजन की प्रस्तुति दी। आज की सभा में दिल्ली, मुंबई, जोधपुर, हैदराबाद आदि विभिन्न जगहों से गुरुदर्शन हेतु श्रद्धालु उपस्थित हुए।

आत्म ध्यान शिक्षक प्रशिक्षण शिविर 14 अक्टूबर से सूरत। आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी म.सा. के सान्निध्य में शिवाचार्य आत्म ध्यान फाउण्डेशन के तत्वावधान में दिनांक 14 अक्टूबर 2024 से 18 अक्टूबर 2024 तक पांच दिवसीय आत्म ध्यान शिक्षक प्रशिक्षण शिविर का आयोजन होगा। शिविर में लगभग 30 प्रशिक्षक भाग लेंगे। जो नाशिक, पुना, लुधियाना, दिल्ली, मुंबई, रायपुर (छत्तीसगढ़), करनाल (हरियाणा) उदयपुर (राजस्थान) आदि देश के विभिन्न प्रांतों के साधक सम्मलित होंगे।

- आचार्य शिवमुनि

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